फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

यूपी चुनाव: अगले राउंड में नंबर नहीं, गणित अहम, जानें- क्या हैं समीकरण

Thu, 23 Feb 2017 03:09 PM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
विज्ञापन
विज्ञापन
आधे सूबे का जनादेश ईवीएम में कैद हो चुका है। 38 जिलों की 209 सीटों पर मतदान के बाद गुणा-गणित बैठा रहे सियासी सूरमाओं का फोकस अब बाकी के चरणों पर है। राजनीतिक दृष्टि से बेहद उपजाऊ, भौगोलिक-सांस्कृतिक सरोकारों से जुड़े इन इलाके में सीटें भले ही कम हैं, लेकिन बेहद अहम हैं। शायद यही वजह है कि पश्चिम से पूरब की तरफ बढ़ रही जंग के सियासी सेनापतियों की वाणी बदलने के साथ हमला करने का तरीका भी बदलता जा रहा है।
विज्ञापन


बसपा सुप्रीमो अब तक घोषणापत्र जारी नहीं करती थीं, तर्क देती थीं कि वह वादे करने में नहीं बल्कि काम करने में भरोसा रखती हैं। अब वे सपा और भाजपा के कामकाज को कठघरे में खड़ा करने के साथ सत्ता में आने पर सिर्फ विकास की बातें कर रहीं हैं।

उनके वादों में पिछड़े व दलितों की रोजी-रोटी का मुद्दा है तो दलितों को इस बात के लिए ताकीद भी कर रहीं है कि भाजपा आएगी तो आरक्षण खत्म कर देगी। बुंदेलखंड राज्य बनाने के वादे पर वह आज भी कायम हैं।
विज्ञापन


भाजपा और सपा-कांग्रेस गठबंधन के नेताओं के बीच शब्दबाण तीखे होते जा रहे हैं। वजह, यही दिखती है कि दोनों को एक-दूसरे पर हमले से ही अपने-अपने वोटों का ध्रुवीकरण होने की उम्मीद दिख रही है।

जिनका निशाना भी बुंदेलखंड, अवध और पूर्वांचल के भावनात्मक मुद्दे हैं, जिनमें आरक्षण का लाभ सभी को न मिलने की मोदी की बात है तो माफिया व भ्रष्टाचार की बात को भी धार दी जा रही है।

ये है इन जिलों का हाल

असल में जिस जमीन पर अब जंग होने वाली है, वह जातीय लिहाज से तो दलित व पिछड़ा फैक्टर काफी प्रभावी है, आर्थिक कसौटी पर भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तुलना में काफी पिछड़ा है। उद्योग-धंधों की कमी से रोजगार का संकट है।

खेती भी पश्चिम की तुलना में काफी बदहाल है। स्वास्थ्य व शिक्षा की दुश्वारियां हैं। एक तरफ बुंदेलखंड, मिर्जापुर व सोनभद्र जैसे पथरीले व उबड़-खाबड़ जमीन वाले इलाके हैं, जहां जहां दलहनी फसलों के अलावा दूसरी उपज लेना काफी मुश्किल है।

पानी, बिजली, यातायात के संकट के साथ शिक्षा व रोजगार की दुश्वारियां हैं। दूसरी तरफ गोंडा से गोरखपुर व वाराणसी के बीच समतल जमीन वाले जिले हैं, जिन पर कई तरह की खेती होती है।

अवध के गोंडा, बहराइच, बलरामपुर, फैजाबाद, अंबेडकरनगर, बस्ती, गोरखपुर, देवरिया, बलिया, वाराणसी, गाजीपुर, इलाहाबाद, कौशांबी जैसे इलाके हैं, जहां हर साल बाढ़ लोगों की मुसीबत बन जाती है।

सियासी हवा बनाने में भी निभाते हैं भूमिका

ये समस्याएं सियासी दलों के लिए भी हर बार मुद्दे व आरोप-प्रत्यारोप का जरिया बनती हैं। पर, आजादी के 70 साल बाद भी यह दुश्वारियां खत्म नहीं हो पाईं।

सांस्कृतिक सरोकारों की बात करें तो इस जमीन पर अयोध्या व काशी के साथ चित्रकूट व प्रयाग जैसे स्थान इसी जमीन पर हैं, जो आस्था से इतर सियासी हवा को भी बनाने व बिगाड़ने में भूमिका निभाते हैं।

पूरे पूर्वांचल के सामाजिक व सांस्कृतिक सरोकारों को छूने वाली गोरक्ष पीठ भी इसी इलाके में है। चुनाव में यह सारे समीकरण सियासी पार्टियों व चेहरों की साख बनाने व बिगाड़ने का काम करते हैं। सीधी-सपाट गणित न होने के कारण यहां के बारे में भविष्यवाणी करना काफी मुश्किल है।

जटिलता जातीय गणित की, सपा ने जीती थीं 110 सीटें

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव - फोटो : amar ujala
जातीय ध्रुवीकरण की गणित और सियासी समीकरणों को बनाने व बिगाड़ने की दिलचस्पी पश्चिम से ज्यादा दिखती है। कारण यह है कि पश्चिम के विपरीत इस इलाके में पिछड़ों को कई उपजातियां हैं, जो अलग-अलग हिस्सों में प्रभावी संख्या में मौजूद हैं।

इनमें कुर्मी, लोध, कुशवाहा, मौर्य, राजभर, निषाद, बिंद, कश्यप, केवट, सैथवार, बढ़ई, नाई, लोहार, नोनिया चौहान जैसी 80 से ज्यादा जातियां शामिल हैं। पूर्वांचल के कई जिलों में भूमिहार वोट भी हैं। दलितों की भी लगभग सभी उपजातियां रहती हैं। इनमें पासी काफी प्रभावी हैं।

इसके अलावा खटिक, वाल्मीकि, बकसोर व धोबी जैसी दलित जातियां प्रभावी संख्या में हैं। प्रदेश के 75 जिलों में से 37 जिलों के तहत आने वाली इन 194 सीटों में 40 सीटें अनुसूचित जबकि दो सीटें जनजाति के लिए आरक्षित हैं। ये जातियां कभी गोलबंदी से वोट देती आई हैं तो कभी अलग-अलग रुझान पर लामबंद होती रही हैं।

सपा की सरकार बनाने में इन सीटों का महत्व कितना अधिक था, इसे सिर्फ नतीजों से ही समझा जा सकता है। वर्ष 2012 में सपा को मिली 223 सीटों में 110 सीटें इन्हीं में से मिली थी। भाजपा को 22 और बसपा को 32 सीटें मिली थीं।

ध्रुवीकरण के समीकरण भी, 20 से 30 प्रतिशत मुस्लिम

आगे की जंग वाली जमीन पर आने वाले कई जिले मुस्लिम आबादी प्रभावित है। आजमगढ़, बहराइच, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, अम्बेडकर नगर, सुल्तानपुर, मऊ, कबीर नगर, श्रावस्ती, गोंडा, फैजाबाद, कुशीनगर, महाराजगंज व वाराणसी जैसे जिलों में 20 से 30 प्रतिशत तक मुस्लिम आबादी है।

पिछले चुनाव में 69 मुस्लिम उम्मीदवार विधायक बने थे, उनमें 29 इसी इलाके से चुने गए थे। शायद यही वजह है कि अब नेताओं के बोल बदलते जा रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही नहीं बल्कि अमित शाह, महंत आदित्यनाथ और केशव मौर्य जैसे नेता प्रदेश की सपा सरकार में मुस्लिम तुष्टिकरण नीति को निशाना बनाकर हमला बोल रहे हैं। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव काशी, गंगा, अयोध्या के साथ संगम पर कराए गए कामों का उल्लेख करके साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि उनकी सरकार ने सिर्फ मुसलमानों ही नहीं बल्कि हिंदुओं की आस्था से जुड़े स्थानों के लिए काम शुरू किए हैं।

बसपा सुप्रीमो मायावती भी इस इलाके के किसानों की बदहाली और भाजपा सरकार बनने पर आरक्षण खत्म होने का भय दिखाकर लामबंदी की कोशिश कर रही है। दलितों के साथ मुस्लिमों की भी लामबंदी हो जाए, शायद इसीलिए वह न सिर्फ यह उल्लेख करना नहीं भूल रही है कि बसपा ने सबसे ज्यादा मुसलमानों को टिकट दिए हैं।

दबंग भी बनाते-बिगाड़ते समीकरण

राजा भैया - फोटो : amar ujala
इन इलाकों में दबंगों के चलते सियासी समीकरण बनते-बिगड़ते हैं। इनमें कुछ समय के साथ अलग-अलग सियासी दलों से सरोकार जोड़ते रहे हैं तो रघुराज प्रताप सिंह जैसे चेहरे निर्दल तो चुनाव बाद दलों के साथ हाथ मिलाकर सूबे में सत्ता की गणित बनाते-बिगाड़ते हैं।

माफिया मुख्तार अंसारी मऊ, गाजीपुर व वाराणसी इलाके में मुस्लिम लामबंदी की सियासत से सियासी शरण तलाशते आए हैं तो कभी अपनी पार्टी बनाकर न सिर्फ अपनी सियासत को धार देते हैं बल्कि दूसरे दलों की राजनीति को भी प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। बृजेश सिंह का चेहरा भी ऐसा ही है।

सिंह भी अपने परिवार के सदस्यों के जरिये पूर्वांचल की सियासत में समीकरण फिट कर अपनी सियासी सुरक्षा तलाशते रहते हैं। इस बार इनके भतीजे सुशील सिंह भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। सुशील के खिलाफ विनीत सिंह भी मैदान में हैं। विनीत का चेहरा भी आपराधिक छवि वाला है।

इसी श्रेणी में आने वाले विजय मिश्र, यशभद्र सिंह उर्फ मोनू सिंह, धनंजय सिंह, अभय सिंह व जितेन्द्र सिंह बबलू भी अलग-अलग सीटों से ताल ठोंक रहे हैं। मुन्ना बजरंगी ने अपनी पत्नी सीमा को मैदान में उतारा है।

स्वाभाविक है कि इन सबकी गणित भी जगह-जगह आगे की जंग की गणित को प्रभावित करने वाली है। देखने वाली बात यही है कि जनता इन्हें जंग से बाहर का रास्ता दिखाकर आगे के सियासी समीकरणों को ठीक करती है या इनके समीकरणों में उलझकर रह जाती है।

लोकसभा चुनाव में बिगड़ गया था सपा का गणित

सपा को भले ही विधानसभा चुनाव में 110 सीटें मिल गई हों, लेकिन लोकसभा चुनाव में उसे सिर्फ 13 ही स्थानों पर बढ़त मिल पाई। इसमें आजमगढ़ भी शामिल है, जहां मुलायम सिंह यादव के चुनाव लड़ने के समीकरणों के चलते यहां की पांच सीटों पर सपा को बढ़त मिली थी।

विधानसभा में 22 सीटें ही हासिल कर पाने वाली भाजपा ने लोकसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन करते हुए 75 स्थानों पर दूसरे दलों पर बढ़त बनाई थी। विधानसभा चुनाव में 32 सीटें हासिल करने वाली बसपा का आंकड़ा लोकसभा चुनाव में सिर्फ आठ सीटों तक सिमट गया। कांग्रेस ने विधानसभा में इनमें से 18 सीटें जीती थीं।

लोकसभा चुनाव में भी उसने रायबरेली व अमेठी संसदीय सीट के अंतर्गत आने वाली विधानसभा की सभी सीटों पर भजपा पर बढ़त बरकरार रखी। पर, सूबे में उसे कुल 14 स्थानों पर ही बढ़त मिली।

भाजपा की कोशिश लोकसभा चुनाव के समीकरण दोहराने की है तो सपा का प्रयास कॉंग्रेस के साथ गठबंधन की ताकत से आंकड़ा सुधारने का दिखाई दे रहा है। विधानसभा के 2007 के चुनाव में इनमें कई सीटें जीत चुकी बसपा भी समीकरणों को दुरुस्त करके प्रदर्शन सुधारने की उम्मीद के साथ जुटी दिखाई दे रही है।
विज्ञापन

अभी तक ये सीटें है पार्टियों के पास

अंतिम चार चरण में 194 सीटों पर रण
इनमें किसके पास कितनी सीटें
समाजवादी पार्टी--110
बहुजन समाज पार्टी--32

भारतीय जनता पार्टी--22
कांग्रेस पार्टी--18
पीस पार्टी--03

कौमी एकता दल--02 (मुख्तार अंसारी की पार्टी)
राष्ट्रवादी कॉंग्रेस पार्टी--1
अपना दल--01
निर्दलीय--05

पहले तीन चरणों वाली सीटों पर कब्जा
सपा--113
बसपा--47
भाजपा--27
कॉंग्रेस--10

रालोद--09
पीस पार्टी--01
अन्य--02
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें