चिनहट और मलिहाबाद की गाड़ियां खराब हुई तो उनकी जगह सीतापुर से गाड़ियां लाकर चला दी गई।
कर्मचारियों को मिलने वाला साप्ताहिक अवकाश भी बंद कर दिया गया।
उनके वेतन से जबरदस्ती प्रतिमाह 200 रुपये कटौती की जाने लगी।
न तो उन्हें वर्दी दी गई और न ही जूता। जिस दिन गाड़ी नहीं चली उस दिन का वेतन भी कंपनी ने रोक लिया।
मरीजों के लिए लाइफ लाइन कही जाने वाली 108 एंबुलेंस सेवा का एक सच ये भी है। कबाड़ हो रही एम्बुलेंस से तय मानकों से अधिक मरीजों को ढोने का दावा किया जा रहा है।
सूत्रों का कहना है कि जीवीके ईएमआर कंपनी ने एम्बुंलेंस के रखरखाव में तो लापरवाही बरती ही कर्मचारियों के साथ तय की गई सेवा नियमावली का भी ध्यान नहीं रखा।
एंबुलेंस खराब होने पर ड्राइवर और ईएमटी का वेतन काटना शुरू कर दिया गया।
कर्मचारियों ने विरोध किया तो उन्हें नौकरी से निकालने की धमकी दी गई।
जबकि सच्चाई यही है कि राजधानी में चल रही 13 गाड़ियों में से यदि एक भी खराब हो जाती है तो उसकी जगह दूसरी गाड़ी मुहैया नहीं करायी जाती। इसके साथ ही ड्राइवर और ईएमटी का वेतन भी काटा जाता है वह अलग से।
कर्मचारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि 108 एंबुलेंस सेवा की हर गाड़ी पर दो ड्राइवर तैनात हैं।
जरूरत पड़ने पर यदि एक छुट्टी पर जाता है तो दूसरे ड्राइवर को 24 घंटे ड्यूटी पर रहना पड़ता है। जबकि नियमत: 24 घंटेे के लिए तीन ड्राइवरों की ड्यूटी होनी चाहिए।
ऐसे में 24 घंटे ड्यूटी कर रहे ड्राइवरों के भरोसे मरीजों को राहत पहुंचाने की जगह मरीजों की जिंदगी दांव पर लगायी जा रही है। हालत ये है कि एक गाड़ी खराब हो तो दूसरे जोन की गाड़ी पर और लोड बढ़ जाता है।