पंचायत चुनाव के दूसरे चरण में मैनपुरी में बूथ कैप्चरिंग करने वाले पैक्सफेड के चेयरमैन तोताराम यादव समेत 17 लोगों पर केस दर्ज कर लिया है। मैनपुरी के विकास खंड बेवर के रायपुर गांव के बूथ नंबर 128 पर जबरन वोट डालने का वीडियो वायरल होने के बाद निर्वाचन आयोग की दखल पर पुलिस ने केस दर्ज किया है।
पूरे घटनाक्रम की रिपोर्ट राज्य निर्वाचन आयोग को भेज दिया गया है।
एसपी का कहना है कि शीघ्र ही आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया जाएगा। उधर, निर्वाचन आयोग ने कैप्चरिंग करने वाले बूथ पर फिर मतदान कराने का फैसला लिया है।
बूथ कैप्चरिंग मामले की गूंज लखनऊ तक पहुंचने के बाद निर्वाचन आयोग ने सख्त रुख अपनाया तो डीएम चंद्रपाल सिंह ने शनिवार की सुबह रिपोर्ट दर्ज करने के आदेश दिए।
इसके बाद निर्वाचन अधिकारी क्षेत्र पंचायत सदस्य बेवर/ बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी राजकुमार ने थाना बेवर में तोताराम यादव, उनके समर्थकों के अलावा बूथ 128 के पीठासीन अधिकारी शरद वर्मा, प्रधानाध्यापक प्रावि नगला जवाहर, मनोज कुमार सक्सेना प्रथम मतदान अधिकारी/वरिष्ठ सहायक सचल दल जॉइंट कमिश्नर व्यापार कर, सत्य प्रकाश शर्मा, मतदान अधिकारी द्वितीय समेत कई लोगों को नामजद किया गया है।
क्या है वीडियो में
तोताराम यादव बेवर के जिला पंचायत के वार्ड 6 से प्रत्याशी हैं। 13 अक्तूबर को पंचायत चुनाव के दूसरे चरण में हुई हिंसा और फर्जी मतदान को लेकर 16 अक्तूबर को एक वीडियो वायरल हुआ। इसमें तोताराम यादव मतपत्रों पर खुद ठप्पा लगाते नजर आ रहे हैं। इस दौरान वहां पर मतदान कर्मियों के अलावा पुलिसकर्मी और कुछ अज्ञात लोग भी दिख रहे हैं। किसी ने उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की।
निर्वाचन आयोग ने माना, जिला प्रशासन की गंभीर चूक
तोताराम यादव मामले में राज्य निर्वाचन आयोग ने माना है कि जिला प्रशासन ने गंभीर चूक की है। उनकी भूमिका संदेह के घेरे में है। इसकी जांच होगी। इसमें जो भी अफसर दोषी हैं उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
राज्य निर्वाचन आयुक्त एसके अग्रवाल ने जिला प्रशासन व पुलिस प्रशासन द्वारा 4 दिन तक घटना छिपाए रखने पर नाराजगी जताई है। आयोग ने शुक्रवार रात प्रमुख सचिव गृह, डीजीपी व एडीजी कानून व्यवस्था से फोन पर बात भी की।
शनिवार सुबह भी इस मामले में कड़ी नाराजगी जताई थी। इसी के बाद तोताराम, सात सुरक्षा कर्मी, चार मतदान अधिकारी व तीन अज्ञात के खिलाफ गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया। अग्रवाल ने कहा कि या तो जिला प्रशासन को इसकी जानकारी न हो या फिर जानबूझकर आयोग को इसकी जानकारी नहीं दी गई।