राज्यमंत्री कैलाश चौरसिया की सदस्यता के मामले में केंद्रीय चुनाव आयोग ने बुधवार को हस्तक्षेप करते हुए उनकी सीट को खाली घोषित करने का निर्देश दिया है।
हालांकि विधानसभा सचिवालय की ओर से शाम तक उनकी सीट को रिक्त घोषित करने का आदेश जारी नहीं हुआ। इस बीच चौरसिया ने सदस्यता बचाने की आखिरी कोशिश के तहत मिर्जापुर के जिला जज की ओर से सजा के क्रियान्वयन पर रोक लगाने संबंधी स्टे ऑर्डर की प्रति विधानसभा अध्यक्ष और राज्य निर्वाचन आयोग को सौंपी है।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक इस मामले में चौरसिया को राहत मिलने की उम्मीद नहीं है। बेसिक शिक्षा, बाल विकास एवं पुष्टाहार राज्यमंत्री कैलाश चौरसिया को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मिर्जापुर की अदालत ने गत 28 फरवरी को तीन साल की सजा सुनाई थी।
सुप्रीम कोर्ट का 13 जुलाई 2013 का आदेश है कि किसी जनप्रतिनिधि (सांसद-विधायक) को दो साल से ज्यादा सजा होने पर वह सदस्यता के अयोग्य घोषित हो जाएगा। चौरसिया को सजा सुनाए जाने के बाद मिर्जापुर जिला प्रशासन ने राज्य निर्वाचन आयोग को अदालत के आदेश समेत रिपोर्ट भेज दी थी। राज्य निर्वाचन आयोग ने यह रिपोर्ट भारत निर्वाचन आयोग को भेजी थी।
वहां से बुधवार को चौरसिया की सीट रिक्त घोषित करके सूचना देने के निर्देश दिए गए हैं। राज्य निर्वाचन आयोग ने भारत चुनाव आयोग के निर्देशों पर अमल के लिए पत्र प्रमुख सचिव विधानसभा को भेज दिया है। हालांकि विधानसभा सचिवालय से बुधवार शाम तक उनकी सीट रिक्त घोषित करने का आदेश जारी नहीं हो पाया है।
चौरसिया की सदस्यता समाप्ति में की जा रही है देरी
जनप्रतिनिधि को सजा सुनाए जाने के बाद सदस्यता के अयोग्य ठहराए जाने की लड़ाई को सर्वोच्च अदालत से जीतने वाले सेवानिवृत्त आईएएस एसएन शुक्ला कहते हैं कि चौरसिया की सदस्यता समाप्ति में अनावश्यक विलंब किया जा रहा है। कप्तान सिंह राजपूत के मामले में भी इसी तरह देरी की गई थी। तब उन्हें राज्यपाल को ई-मेल भेजकर शिकायत करनी पड़ी थी।
शुक्ला का कहना है कि रशीद मसूद, लालू प्रसाद यादव और जगदीश शर्मा को सदस्यता के अयोग्य ठहराए जाने के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के पालन की प्रक्रिया तय हो चुकी है। अटॉर्नी जनरल और लॉ मिनिस्ट्री ने इस मामले में लोकसभा महासचिव को अतिशीघ्र सीट रिक्त करने के लिए कहा था। विधानसभा सदस्य के मामले में सीट रिक्त घोषित करने की विज्ञप्ति प्रमुख सचिव विधानसभा को जारी करनी है।
क्या है मामला
मिर्जापुर के विधायक कैलाश चौरसिया के खिलाफ 19 अक्तूबर 1995 को डाकिया से मारपीट, जान से मारने की धमकी देने और डाक का बंडल छीनकर सरकारी कामकाज में बाधा पहुंचाने के आरोपों में मुकदमा दर्ज हुआ था। मिर्जापुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने चौरसिया को गत 28 फरवरी को धारा 353 में दो वर्ष की सजा और दो हजार रुपये जुर्माना, धारा 504 में दो वर्ष की सजा और दो हजार रुपये जुर्माना तथा धारा 506 में तीन वर्ष की सजा और पांच हजार रुपये जुर्माना लगाया था। दस मार्च को जिला जज मिर्जापुर की अदालत ने चौरसिया की सजा के क्रियान्वयन पर 10 अप्रैल तक रोक लगा दी है।
चौरसिया ने दाखिल की स्टे की कॉपी
कैलाश चौरसिया ने बुधवार को अपनी सजा के क्रियान्वयन पर रोक लगाने संबंधी मिर्जापुर के जिला जज के आदेश की प्रति विधानसभा अध्यक्ष और राज्य निर्वाचन आयोग को रिसीव कराई है। विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय ने इसे आवश्यक कार्यवाही के लिए प्रमुख सचिव विधानसभा प्रदीप दुबे को भेज दिया है। उधर, राज्य निर्वाचन अधिकारी ने इसे भारत निर्वाचन आयोग को भेज दिया है।
प्रमुख सचिव को भेजा पत्र
मामले पर उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य निर्वाचन अधिकारी रमाकांत पांडे भारत निर्वाचन आयोग से कैलाश चौरसिया की सीट रिक्त घोषित करने के निर्देश मिले थे। मैंने इसे अग्रिम कार्यवाही के लिए प्रमुख सचिव विधानसभा को भेज दिया है। किसी भी सदस्य की सीट रिक्त घोषित करने का आदेश वही जारी करते हैं। कैलाश चौरसिया की ओर से सजा पर स्थगनादेश की प्रति मिली थी। इसे भारत निर्वाचन आयोग को भेज दिया गया है।
पत्रों का करा रहे परीक्षण
विधानसभा सचिवालय से जारी हुए वक्तव्य में कहा गया है कि कैलाश चौरसिया की सीट रिक्त घोषित करने के संबंध में निर्वाचन आयोग का पत्र मिला है। इस बीच चौरसिया ने जिला जज मिर्जापुर के सजा पर स्थगनादेश की प्रति के साथ विधानसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपा है। इसे प्रमुख सचिव विधानसभा को भेज दिया गया है। दोनों पत्रों का वैधानिक परीक्षण कराया जा रहा है।
इसलिए नहीं बच पाएगी सदस्यता
सेवानिवृत्त आईएएस और लोक प्रहरी के संयोजक एसएन शुक्ला कहते हैं सुप्रीम कोर्ट के फैसले में साफ है कि दो साल से ज्यादा की सजा हो जाने के बाद लोकसभा या विधानसभा सदस्य स्वत: सदस्यता के अयोग्य घोषित हो जाएंगे। भले ही सदस्य ने अपील या रिवीजन क्यों न दाखिल किया हो।
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा (8) की उपधारा (4) के तहत सजा के बाद भी सदस्यों को राहत मिल जाती थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस उपधारा को ही समाप्त कर दिया है। ऐसे में कैलाश चौरसिया उसी दिन से सदस्यता के अयोग्य हो गए हैं जिस दिन उन्हें सजा सुनाई गई थी।