चुनाव में दिल्ली में बतौर विकल्प आम आदमी पार्टी ‘आप’ के ताप को समझना होगा।
खासतौर से यूपी में बाहुबलियों और दागियों के सहारे लोकसभा चुनाव की वैतरणी पार करने का ख्वाब देखने वालों को। इनके लिए दिल्ली नसीहत बनी है और सबक भी।
यह संकेत भी दिया है कि अब भी समय है, खुद को ठीक कर लो वरना हाल कुछ वैसा ही होगा जैसा दिल्ली में हुआ है।
यह नसीहत व सबक अथवा संकेत यूपी की किसी एक पार्टी के लिए नहीं है। हर दल और उसके नेता के लिए चेतावनी है कि न सिर्फ अपराधियों बल्कि भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देना बंद करो। पर, चुनौती खुद ‘आप’ के लिए भी कम नहीं है।
दिल्ली में परचम फहराने के बावजूद इस पार्टी के अगुवा अरविंद केजरीवाल और संजय सिंह सरीखे लोगों को अपने गृहराज्य उत्तर प्रदेश में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए काफी कुछ करना होगा। जो बहुत आसान नहीं लग रहा है। हालांकि ‘आप’ के लोग ऐसा नहीं मानते।
भले ही ‘आप’ ने दिल्ली जैसे छोटे राज्य में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई हो लेकिन इसके संदेश व सबक को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
प्रदेश में लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटे सभी राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि आगे होने वाले चुनाव में उनका भाग्य वही युवा वर्ग लिखने वाला है जिसने दिल्ली में ‘आप’ को तो मध्यप्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ में भाजपा को सत्ता सौंप दी है।
भले ही दिल्ली में अतीक अहमद, बृजभूषण शरण सिंह, गुड्डू पंडित, मित्रसेन यादव जैसे चेहरे न रहे हों लेकिन शीला सरकार पर आम आदमी के उत्पीड़न के कई आरोप लगे।
भ्रष्टाचार को लेकर भी उनकी सरकार कई बार घिरी। माना जा रहा है कि इन्हीं सब वजहों से दिल्ली में लोगों ने कांग्रेस के खिलाफ विकल्प की तलाश की।
कुछ लोगों ने भाजपा पर भरोसा किया तो कुछ लोगों, खासतौर से युवा ने राजनीति में नए प्रयोग और साफ-सुथरे चेहरों को चुनाव मैदान में उतारने वाली ‘आप’ को ताकत दे दी।
बाहुबलियों के लिए उल्टी गिनती शुरू
स्वाभाविक है कि दिल्ली के नतीजों को मद्देनजर रखकर ही उत्तर प्रदेश के सियासी दलों को अपनी नीति व निर्णय करने होंगे।
इस बार लोकसभा चुनाव में मतदान करने वालों में एक चौथाई 18-25 वर्ष वाले युवा हैं। यानी यूपी के करीब 13 करोड़ मतदाताओं में 25 फीसदी मतदाता इस आयु वर्ग का है।
बेहतर भविष्य की चाह रखने वाले इन युवाओं की पसंद किसी भी स्थिति में अतीक अहमद, बाबू सिंह कुशवाहा, गुड्डू पंडित, रामू द्विवेदी, धनंजय सिंह, बृजभूषण शरण सिंह, मुख्तार अंसारी नहीं हो सकते। ये लोग किसी समीकरण से भले ही सीट निकाल लें, लेकिन इनके लिए उल्टी गिनती शुरू हो गई है।
शीला के हश्र से लेना होगा सबक
सपा इस समय प्रदेश में सरकार में है। उसे सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार का खात्मा न करने की फिक्र करनी होगी। साथ ही जनसमस्याओं पर गंभीरता से ध्यान और तेजी से उसके समाधान के बारे में सोचना होगा।
सिर्फ सपा ही नहीं बसपा, भाजपा और कांग्रेस या अन्य किसी दल के लिए भी दिल्ली में ‘आप’ के उदय के अर्थ को समझकर अपनी भूमिका तय करनी होगी।
इनको विचार करना पड़ेगा कि युवा मतदाता लेन-देन को लेकर अब बहुत समझौतावादी नहीं रहा है। इसलिए भ्रष्टाचार से निजात दिलाने का ठोस कार्यक्रम लेकर उन्हें जनता के बीच उतरना होगा।
साथ ही ऐसे नेताओं से दूरी भी बनानी होगी। फिक्र न की तो उनका हाल भी कुछ वैसा ही हो सकता है कि जैसा दिल्ली में शीला दीक्षित सरकार का हुआ है।
पर, ‘आप’ के लिए भी राह बहुत आसान नहीं
राजनीतिक समीक्षकों का कहना है कि ‘आप’ के कुछ नेता अति उत्साह में भले ही लोकसभा चुनाव में दिल्ली जैसा करिश्मा दोहराने का दावा कर रहे हों, लेकिन इसकी संभावना दूर-दूर तक नहीं है। लड़ेंगे भी तो सिर्फ उन कुछ सीटों पर जहां का मतदाता वोट को लेकर बहुत कमिटेड न रहता हो।
समीक्षकों का तर्क है कि ‘आप’ के लिए जो लोग काम कर रहे हैं, उनमें योगेन्द्र यादव हों अथवा कोई अन्य, कोई भी इतना नासमझ नहीं है जिसे इस बात का एहसास न हो कि दिल्ली में उसे तीसरे विकल्प का लाभ मिला है। पर, ऐसी स्थिति यूपी में नहीं है।
यहां भाजपा और कांग्रेस एक-दूसरे के विकल्प तो हैं ही। तीसरे विकल्प के रूप में सपा और चौथे विकल्प के रूप में बसपा भी है।
ऐसी स्थिति में ‘आप’ विकल्प के तौर पर पांचवे नंबर पर आएगी। जहां तक मतदाताओं को पहुंचना बहुत मुश्किल होगा। अन्य कई मुश्किलें भी यूपी में ‘आप’ के सामने खड़ी हैं।
जातियां भी कम चुनौती नहीं
यूपी में ‘आप’ जैसे दलों के लिए जातीय समीकरण भी बड़ी चुनौती हैं। अपवाद छोड़ दें तो राजनीतिक दलों की नहीं बल्कि सांसदों, विधायकों व नेताओं की भी उनकी जाति के आधार पर की जाती है।
मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी का वजूद लगभग 8 प्रतिशत यादव मतदाताओं पर टिका है तो मायावती व बसपा की ताकत हर स्थिति में उनके साथ लामबंद रहने वाले 15-16 प्रतिशत जाटव, कुरील, रैदास जैसी जातियां हैं।
किसी इलाके में बेनीप्रसाद वर्मा कुर्मियों के वोटों की गोलबंदी करते हैं तो किसी जगह कल्याण सिंह के नाम पर लोध मतदाताओं को लामबंद किया जाता है।
चुनाव के दौरान मुस्लिम मतदाताओं का रुझान अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न तरह से होता है। कहीं भाजपा को हराने के लिए तो कहीं मुस्लिम उम्मीदवार को जिताने के लिए।
राजनीतिक विश्लेषक रतनमणि लाल कहते हैं कि दिल्ली के मतदाताओं का चरित्र महानगर वाला है। वहां राजनीति में न तो उस तरह से जाति का जोर दिखा और न संप्रदायवाद का। पर, यूपी का पानी ऐसा नहीं है।
दिल्ली से जैसे ही गाजियाबाद आइए तो यहां जाटों व वैश्यों की जातीय गोलबंदी राजनीतिक भविष्य तय करती हुई मिलेगी।
लखनऊ में दूसरे सामाजिक समीकरण काम करते हैं तो पूर्वांचल व बुंदेलखंड के सामाजिक समीकरण अलग तरह से काम करते हैं।
इन सबके मद्देनजर ‘आप’ को भाजपा, सपा, कांग्रेस और बसपा को एक साथ धूल चटाने के लिए काफी कुछ करना होगा।
लेकिन अलग है ‘आप’ का नजरिया
‘आप’ के प्रमुख नेता संजय सिंह तर्क देते हैं कि दिल्ली ऐसा प्रदेश है जिसमें सभी प्रदेश के लोग रहते हैं। इसलिए दिल्ली के नतीजे पूरे देश की जनता के मूड को बताने वाले हैं।
दिल्ली के नतीजों से साफ हो गया है कि सिर्फ यूपी ही नहीं बल्कि पूरे देश में साफ-सुथरे राजनीतिक विकल्प की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
यह बात ठीक है कि यूपी की राजनीति संक्रमणकाल से गुजर रही है। राजनीतिक परिस्थितियां काफी भिन्न हो गई हैं। जातियों व बंदूक की संस्कृति हावी है। पर, हम लोग आशान्वित हैं।
जनता बदलाव चाहती है। साफ-सुथरे लोगों को अपना प्रतिनिधि बनाना चाहती है। हम यूपी के लोगों के सामने यह विकल्प रखने की कोशिश करेंगे।