स्मारक घोटाले में बसपा शासनकाल के दो मंत्रियों नसीमुद्दीन सिद्दीकी व बाबू सिंह कुशवाहा समेत 19 के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के बाद ईडी ने हड़पी गई रकम का आकलन करना शुरू कर दिया है।
इस कवायद में ईडी ने पाया है कि जिन बीस बड़ी फर्मों को आगे कर मोटा माल कमाया गया, वह सभी दोनों पूर्व मंत्रियों से सीधे तौर पर जुड़ी थीं।
14.10 अरब रुपये से अधिक के स्मारक घोटाले में दो पूर्व मंत्रियों नसीमुद्दीन सिद्दीकी व बाबूसिंह कुशवाहा समेत 19 के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज करने के फौरन बाद ईडी अब इन सभी की चल-अचल संपत्ति की पड़ताल शुरू कर दी है।
करीबियों के बैंक खाते भी देखे जाएंगे
ईडी यह पता लगाएगा कि घोटालेबाजों के पास कितना हिस्सा गया और मंत्रियों ने कैसे लाभ कमाया। जो रकम हड़पी गई, उसका क्या हुआ। उसे कहां खपाया गया व किसने कहां निवेश किया।
इसके लिए ईडी ने फर्मों के खातों की जांच को सबसे अधिक अहमियत दी है। घोटाले की अवधि में इन सभी फर्मों के खातों में जमा व निकासी की रकम को देखा जा रहा है।
किस खाते से रकम को किस खाते में ले जाया गया, या किसी फर्म के खाते से बड़ी निकासी हुई और उसके एक से दो दिन के अंदर किसी बड़े आरोपी के खाते में रकम जमा की गई, इसका भी पता लगाया जा रहा है।
इसके अलावा ईडी दोनों पूर्व मंत्रियों की चल-अचल संपत्ति व उनके करीबियों की संपत्ति व बैंक खातों की जानकारी भी जुटा रही है।
अपने बंगलों में बैठ कर डीलिंग करते थे मंत्री
ईडी ने पड़ताल में पाया है कि अरबों के प्रोजेक्ट में बंदरबांट का षड्यंत्र शुरुआत से ही तय हो गया था। इस वजह से संबंधित मंत्रियों ने मनमाने तरीके से काम किया और कराया।
महत्वपूर्ण फैसलों के लिए मंत्रियों ने अपने कार्यालयों के बजाय आवासों पर बैठकें की और मनचाहे अफसरों को तैनात करवाया।
लोकायुक्त की संस्तुति और आर्थिक अपराध शाखा की जांच के बाद राज्य सरकार के निर्देश पर विजिलेंस ने पूर्व में लखनऊ के गोमतीनगर थाने में स्मारकों व उद्यान आदि के निर्माण में हुए घोटाला में नसीमुद्दीन सिद्दीकी व बाबू सिंह कुशवाहा समेत कुल 19 के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज कराई थी।
एफआईआर में भी मंत्रियों के आवास पर महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए बैठक बुलाने का जिक्र है।