डॉक्टरों की संवेदनहीनता एक बार फिर उजागर हुई है। पेट दर्द से तड़पती किशोरी का इलाज करने की बजाए इमरजेंसी के डॉक्टरों ने उसे गंभीर हालत में पीजीआई रेफर कर दिया।
परिवारीजन मिन्नतें करते रहे लेकिन उनकी एक न चली। बाद में घरवाले उसे इमरजेंसी के बाहर ले आए लेकिन एंबुलेंस न मिलने पर वो दर्द से तड़पते-तड़पते स्ट्रेचर पर ही बेहोश हो गई।
मोहनलालगंज के अमरपाल सिंह की पुत्री पिंकेश सिंह (17) को पेट में तेज दर्द उठने के बाद रविवार सुबह अस्पताल की इमरजेंसी में (बीएचटी संख्या 36450) बेड नंबर बी-29 पर भर्ती कराया गया।
कई घंटों के इलाज के बाद भी आराम नहीं मिला। करीब तीन बजे वह दर्द से तड़पते हुए वार्ड में जोर-जोर से चिल्लाने लगी।
आननफानन में वार्ड में पहुंचे इनडोर, इमरजेंसी मेडिकल ऑफिसर सुमेर सिंह ने गंभीर हालत को देखते हुए परिवार के लोगों को उसे पीजीआई ले जाने की सलाह दी।
इमरजेंसी स्टाफ ने फटाफट डिस्चार्ज स्लिप तैयार कर परिवारीजनों को थमा दी और बिना एंबुलेंस के ही उसे स्ट्रेचर पर लादकर इमरजेंसी गेट तक पहुंचा दिया।
किशोरी की हालत देख घबराए परिवार के सदस्य भागते हुए ऑटो की व्यवस्था करने अस्पताल के बाहर गए। करीब बीस मिनट बाद किशोरी का भाई ऑटो लेकर पहुंचा पर पिंकेश बेहोश हो चुकी थी।
पिता अमर पाल ने बताया की इमरजेंसी में इलाज के नाम पर ग्लूकोज की बोतल, कुछ गोली और इंजेक्शन दे दिया। फिर भी दर्द कम नहीं हुआ।
रेफर मरीज को नहीं मिली एंबुलेंस
पिंकेंश की गंभीर हालत को देखते हुए उसे इमरजेंसी के डॉक्टरों ने पीजीआई तो रेफर कर दिया, लेकिन नियमों के मुताबिक रेफर मरीज को अस्पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेंस दी जानी चाहिए।
इमरजेंसी के बाहर लगे ड्यूटी बोर्ड पर दोपहर तीन बजे एंबुलेंस नंबर 0612 और एक ड्राइवर की तैनाती अंकित थी, पर डॉक्टरों ने डिस्चार्ज स्लिप पर एंबुलेंस देने की कोई बात नहीं लिखी।
लड़की के भाई का आरोप था कि डॉक्टर अल्ट्रासाउंड कराने की बात कर रहे थे लेकिन रविवार को पैथोलॉजी बंद होने के चलते उसकी जांच नहीं हो सकी। काफी कहने पर भी सही इलाज नहीं मिला।