सीजोफ्रेनिया ऐसा मानसिक रोग है जिसमें रोगी को अपने व्यक्तित्व का कुछ पता नहीं रहता। उसके जीवन में न तो खुशी रहती है और न ही गम। अपने खिलाफ साजिश होने की आशंका का डर और अपने आपको संभालने की शक्ति न रहना भी इसके लक्षण हैं।
जिस व्यक्ति में भी ये लक्षण हैं उसे तुरंत डॉक्टर से मशविरा लेना चाहिए। यह कहना है कि केजीएमयू के मानसिक रोग विभाग के हेड प्रो.पीके दलाल का। उन्होंने बताया कि सीजोफ्रेनिक लोग अंधविश्वासी होते हैं और उनसे वार्तालाप भी करते हैं ।
यहां तक कि उनके आदेश बताकर बलि भी दे देते हैं। परिवार के सदस्य के व्यवहार में अचानक बदलाव आ जाए, वह हर किसी पर शक करने लगे, अपने से डरने लगे, उसे हर वक्त अपने ऊपर हमले का डर बना रहे तो उसे किसी मानसिक रोग विशेषज्ञ को दिखाने की जरूरत है।
क्योंकि गंभीर स्थिति आने पर इस बीमारी का इलाज जरूरी हो जाता है। इससे रोग को गंभीर होने से रोका जा सकता है। प्रो. दलाल का कहना है कि जनसंख्या का एक फीसदी अपने जीवनकाल में सीजोफ्रेनिया का शिकार जरूर होता है। केजीएमयू की ओपीडी में लगभग 50 मरीज इस बीमारी से पीड़ित पहुंचते हैं।
सीजोफ्रेनिया के प्रकार
सामान्य सीजोफ्रेनिया
यह रोग की शुरुआती अवस्था होती है। मरीज चुपचाप व खोया-खोया सा रहता है। घर से बाहर जाना, लोगों से मिलना अच्छा नहीं लगता। वह स्वयं को दूसरों से बहुत दूर कर लेता है।
मरीज हर व्यक्ति पर करता है शक
डेमो
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पैरानॉएड सीजोफ्रेनिया
इससे पीड़ित मरीज हर व्यक्ति पर शक करता है। उसे यही डर बना रहता है कि कोई उसे मारना चाहता है। इस वजह से वह सामान्य जिंदगी नहीं जी पाता है, न ही अपने विचार किसी से बांट पाता है। वह ये मानता है कि जो वह सोच रहा है वही सही है।
हेबेफ्रेनिक सीजोफ्रेनिया
इस स्थिति में मरीज ऐसी बातें करते या कहते हैं, जिनका कोई अर्थ नहीं होता। मरीज खुद ही नए-नए शब्द बना लेता है। वह वाक्यों और शब्दों को गलत तरीके से बोलते हैं।
केटाटॉनिक सीजोफ्रेनिया
केटाटॉनिक सीजोफ्रेनिया दो तरह का होता है। केटाटॉनिक स्टूपर और केटाटॉनिक एक्साइटमेंट। केटाटॉनिक स्टूपर में मरीज सेमी कोमा में होता है। वह काफी देर तक एक ही स्थिति में बैठा रहता है। केटाटॉनिक एक्साइटमेंट में मरीज हिंसक हो जाता है।
बॉयोकेमिकल चेंज से होता है ऐसा
प्रो. पी.के.दलाल बताते हैं कि ये बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है। उनकी ओपीडी में आने वाले मरीज औसतन 18 से 45 वर्ष की उम्र के होते हैं।
- दिमाग में होनेवाले बायोकेमिकल चेंजेज।
- डोपामाइन नाम का केमिकल हमारी सोच को प्रभावित करता है। इसके इंबैलेंस होने से भी यह प्रॉब्लम हो सकती है।
- अगर व्यक्ति बेहद इंट्रोवर्ट है और किसी से मिलता-जुलता नहीं है, तो भी ऐसा हो सकता है।
मरीज से करें खुल कर बातें
डेमो
- परिवार या नौकरी का तनाव स्ट्रेस भी बीमारी का कारण है।
- आनुवंशिक कारण भी इसके लिए जिम्मेदार हैं।
- यदि माता-पिता, भाई-बहन को यह बीमारी है, तो बच्चों में यह रोग होने की संभावना सामान्य आदमी के मुकाबले 10 गुना ज्यादा होती है।
डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. देवाशीष शुक्ला के अनुसार मरीज को परिवार का पूरा सहयोग मिलना चाहिए। उसे कभी अकेला और खाली न छोड़ें। मरीज से खुल कर बात करें और उसके विचार जानें।
उसे काम में व्यस्त रखें और नए कार्यों के लिए प्रोत्साहित करें। कोशिश करें कि उसके सामने दूसरों की सामाजिक सफलताओं का बखान कर उसमें हीन भावना न आने दें।
उसके तनाव में रहने का कारण जानें और उन्हें दूर करने की कोशिश करें। उसका तनाव दूर करने के लिए योग का सहारा भी लिया जा सकता है। परिवार और दोस्त मिलकर उसे इस परेशानी से बाहर ला सकते हैं।