लखनऊ। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ‘गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक’ (पीसी एंड पीएनडीटी) अधिनियम, 1994 के तहत शिकायत केवल उपयुक्त प्राधिकारी तक ही सीमित नहीं है। कोर्ट ने कहा कि जिला मजिस्ट्रेट, जो उपयुक्त प्राधिकारी के रूप में कार्य करते हैं, उनके पास कानूनी कार्रवाई शुरू करने की शक्ति किसी अन्य अधिकारी को डेलिगेट (प्रत्यायोजित) करने का पूरा अधिकार है।
न्यायमूर्ति बृजराज सिंह ने यह आदेश डॉ. गायत्री सिंह की धारा 482 के तहत दायर याचिका को खारिज करते हुए दिया। याचिकाकर्ता ने निचली अदालत में अपनी डिस्चार्ज (आरोप मुक्त करने) की अर्जी खारिज होने के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने पाया कि डीएम द्वारा शिकायत दर्ज कराने के लिए दिया गया प्राधिकार पूरी तरह वैध था, इसलिए शिकायत सुनवाई योग्य है।
यह है मामला
13 नवंबर 2008 को मां चंद्रिका देवी मैटरनिटी एंड सर्जिकल सेंटर में तलाशी और जब्ती की कार्रवाई हुई थी। इस पर तत्कालीन एसीएमओ डॉ. एके चौधरी ने 18 नवंबर 2008 को शिकायत दर्ज कराई थी। मजिस्ट्रेट अदालत ने इस पर संज्ञान लिया था। केंद्र में स्त्री रोग विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत याचिकाकर्ता ने पहले सीजीएम के समक्ष डिस्चार्ज अर्जी लगाई थी, जिसे 13 जून 2024 को खारिज कर दिया गया। इसके बाद विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) ने भी 18 नवंबर 2025 को याचिकाकर्ता की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने भी अब इन फैसलों को बरकरार रखते हुए याचिका में कोई सार न पाते हुए इसे निरस्त कर दिया है।