राजनीति में मुकाम के लिए समीकरण के हिसाब से सियासतदान क्षेत्र तय करते हैं। समीकरण के लिहाज से ही सुरक्षित क्षेत्र चुनकर संसद पहुंचने की लालसा में कदम बढ़ाते हैं। अपना क्षेत्र छोड़कर दूसरे जिले में भी शरण लेते हैं। श्रावस्ती संसदीय क्षेत्र के साथ ही मंडल की अन्य सीटों पर मैदान में उतरे सियासी सूरमा खुद को वोट नहीं दे पाएंगे, कारण वह दूसरे क्षेत्र में मतदाता हैं। वहां वह किसी और को चुनेंगे, जबकि जहां लड़ रहे हैं वहां दूसरों के सामने झोली फैलाए हैं।
देवीपाटन मंडल के चार में से तीन संसदीय क्षेत्रों में भाजपा व सपा के छह प्रत्याशी मैदान में हैं। इनमें चार ऐसे हैं जो जहां से लड़ रहे हैं वहां के मतदाता ही नहीं हैं। ऐसे में वे खुद का या परिवार के सदस्यों का मत नहीं पा सकेंगे। श्रावस्ती संसदीय सीट पर ही गौर करें तो अब तक के घोषित दोनों प्रत्याशी गैर जिले से ताल्लुक रखते हैं। भाजपा के साकेत मिश्र का ननिहाल भले ही श्रावस्ती में है, लेकिन वह देवरिया जिले के मूल निवासी हैं। अलबत्ता उनकी कर्मभूमि श्रावस्ती ही रही है। यहां उन्होंने लगातार सामाजिक कार्य किया है। इसी तरह सपा प्रत्याशी राम शिरोमणि वर्मा जो यहां के मौजूदा सांसद हैं, वह भी अंबेडकरनगर जिले के निवासी हैं। ये दोनों प्रत्याशी अपने जिले में जहां दूसरे को चुनेंगे, वहीं खुद को वोट देने से वंचित रहेंगे।
बहराइच में सपा प्रत्याशी रमेश गौतम भी गोंडा जिले के हैं। वह 2007 में विधायक भी रह चुके हैं। उस समय भी वह गोंडा के डिक्सिर विधानसभा (अब तरबगंज) से चुनाव लड़े थे, जबकि निवासी कटरा बाजार विधानसभा के रहे। इसके बाद वह मनकापुर से चुनाव लड़े। कभी खुद को वोट नहीं दे सके। गोंडा संसदीय सीट से सपा प्रत्याशी श्रेया वर्मा भी बाराबंकी जिले की रहने वाली हैं।
घर न होने के बाद मिली सफलता ने दिखाई राह
राजनीति में बाहरी नेताओं को सफलता मिली तो अन्य को भी राह मिली। भले ही खुद को वोट नहीं कर सके, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी और नानाजी देशमुख सरीखे नेता बलरामपुर संसदीय सीट (अब श्रावस्ती) से ही सदन तक पहुंचे। यह सिलसिला आगे भी कायम रहा। ऐसे ही गोंडा, कैसरगंज व बहराइच संसदीय सीटों से भी बाहर के लोगों ने सदन में कदम रखा। इसके बाद से एक दौर ही चल रहा है।
जातीय समीकरण और पार्टी में पकड़ से मिलता है अवसर
संसदीय चुनाव में क्षेत्र तय करने में पार्टियां हर समीकरण साधती हैं। पहला तो जातीय समीकरण अहम होता है, वहीं पार्टियों में दावेदारों की पकड़ भी काम आती है। श्रावस्ती में सजातीय मतदाताओं की बाहुलता के साथ ही पार्टी में अच्छी पकड़ से साकेत मिश्र को टिकट मिला। सपा के राम शिरोमणि वर्मा को सजातीय मतदाताओं के साथ ही मौजूदा सांसद होने का लाभ मिला। इसी तरह बीते 2019 के चुनाव में कैसरगंज से विधायक व प्रदेश सरकार में मंत्री रहे मुकुट बिहारी वर्मा को भाजपा ने अंबेडकरनगर से प्रत्याशी बनाया था, जहां कुर्मी वोटरों को साधने की कोशिश की गई थी। यह अलग बात है कि मुकुट बिहारी चुनाव नहीं जीत सके थे।
तो बाहरी से जनता को नहीं होती शिकायत
बाहरी प्रत्याशी आम लोगों के बीच जल्दी पैठ बनाने में सफल भी हो जाते हैं। इसके पीछे खास वजह होती है कि उनसे आम लोगों को कोई शिकायत नहीं रहती। स्थानीय दावेदार किसी न किसी मौके पर गांवों की पार्टीबंदी से जुड़ जाते हैं। इससे चुनाव के वक्त भीतरी विरोध का भी सामना करना पड़ता है। लोग मुखर तो नहीं हाेते हैं, लेकिन मतदान के दिन अपनी ताकत का एहसास जरूर करा देते हैं। वहीं, बाहरी से पुरानी किसी तरह की अदावत नहीं रहती।