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मुस्कुराते चेहरे के पीछे बीमार मन

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मुस्कुराते चेहरे के पीछे बीमार मन
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केस-1 विजेता बनने की जिद
एक ब्यूरोक्रेट हैं, जिनकी सोच हर हाल में खुद को विजेता साबित करने की है। और है भी ऐसा ही, किसी भी फ्रंट पर आप उन्हें जोश से भरा हुआ ही देखेंगे। पर तस्वीर का ये एक पहलू है। घर के अंदर वे शांत, अकेले और अलग-थलग से उदास रहते हैं, जबकि परिवार में सब हैं। धीरे-धीरे अनिद्रा और फिर बीपी की समस्या और हृदय रोग की चपेट में आ गए। डॉक्टर ने उन्हें साइकोथेरेपिस्ट को रेफर किया, उनकी काउंसलिंग शहर की एक निजी क्लीनिक में चल रही है।
केस-2 बर्बाद हो गया, फिर भी सब ठीक है
25 साल का एक युवक, आईटी सेक्टर में मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छी खासी नौकरी करता है। उसकी परफॉर्मेंस भी अच्छी है। दिन-रात मेहनत के बाद भी नींद कोसों दूर है, वह असहज रहने लगता है। एक दिन वह शराब पीना शुरू कर देता है। नौकरी जाती है, ब्रेकअप हो जाता है। दिन-ब-दिन बिगड़ते हालात देख उसके माता-पिता उसे केजीेएमयू में मनोचिकित्सक के पास लेकर जाते हैं। केस स्टडी के दौरान भी वह हंसता-मुस्कुराता कहता है कि कुछ नहीं हुआ।
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केस-3 चिंता में डूबी हुई मुखौटा लगाए जी रही थी
लोहिया अस्पताल में एक बीडीएस स्टूडेंट का इलाज शुरू होता है। हंसमुख और जोश से भरी इस लड़की को देखकर कोई कह नहीं सकता कि यह अंदर से टूटी हुई और चिंता में डूबी हुई है। डिप्रेशन के इलाज के लिए वह आई थी। केस स्टडी शुरू हुई तो उसके चेहरे से मुस्कुराहट का मुखौटा हटा और हकीकत सामने आ गई।
लखनऊ। ब्यूरोक्रेट्स हों या फिर टेक्नोक्रेट, शिक्षाविद् से लेकर मनोवैज्ञानिक तक एक नए प्रकार के अवसाद से घिरते जा रहे हैं। इसे राजधानी के मनोचिकित्सक स्माइलिंग या मास्क डिप्रेशन कहते हैं। यानी आप बाहर से तो खुश दिखते हैं, लेकिन अंदर से निराश, हैरान और टूटे हुए हैं। हालांकि इसका जिक्र मेंटल हेल्थ गाइडलाइन में नहीं मिलता, लेकिन इसे गंभीर मानसिक बीमारी मानकर इसका इलाज करने की सलाह दी जा रही है।
चिकित्सकों का कहना है कि मानसिक बीमार लोगों में 80 फीसदी अवसाद पीड़ित हैं और इसमें से 33 से 40 फीसदी के करीब स्माइलिंग डिप्रेशन का शिकार हैं। केेजीएमयू में एसोसिएट प्रोफेसरडॉ. आदर्श त्रिपाठी के मुताबिक, हफ्ते में दो दिन की ओपीडी में 40 प्रतिशत अवसाद पीड़ित मरीज आते हैं, जिसमें से 50 फीसदी स्माइलिंग डिप्रेशन का शिकार हैं। लोहिया अस्पताल में हर दिन ओपीडी में मानसिक बीमार देखे जाते हैं। डॉ. देवाशीष कहते हैं कि 70 फीसदी अवसाद पीड़ित हैं और तीन में से एक मरीज खुशी का आवरण ओढ़े जी रहा है। निश्चित तौर पर अपर और मिडिल क्लास ज्यादा हैं। इलिट ग्रुप सरकारी अस्पतालों के बजाय प्राइवेट क्लीनिक पर जाता है। जानी मानी निजी मनोचिकित्सक व बीबीएयू में चीफ साइकोलॉजिकल काउंसलर डॉ. नेहा आनंद कहती हैं कि हमारे पास रेफर केस भी आते हैं। रोजाना 6-7 सेशन चलते हैं, जिसमें से तीन मरीज ऐसे होते हैं, जो इसी तरह के होते हैं। सच तो यह है कि खुद मनोवैज्ञानिक भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। यह एक भयावह स्थिति है।
कारण : ....क्योंकि हम अपनी छवि को बदलना नहीं चाहते
डॉ. आदर्श त्रिपाठी कहते हैं कि इस अवसाद का सबसे बड़ा कारण है कि हम स्वीकार ही नहीं करना चाहते कि हम कमजोर हो सकते हैं। लोग क्या सोचेंगे या कहेंगे इसको लेकर मनोचिकित्सक को दिखाने से डरते हैं। कई बार लोग कविता, कहानियों, पेंटिंग्स बनाने जैसे शौक में अपनी तकलीफ छिपाने लगते हैं। यह कुछ समय के लिए हमें राहत तो देता है, लेकिन स्थायी उपचार नहीं है।
लक्षण : हर खुश व्यक्ति बीमार नहीं, लेकिन इन लक्षणों को पहचानें
लोहिया अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. देवाशीष कहते हैं कि विपरीत हालात में मुस्कुराना अच्छी बात है। हर खुश व्यक्ति बीमार नहीं है, लेकिन खुद को परखते रहें कि कहीं आपने भी तो खुशी का सिर्फ आवरण तो नहीं ओढ़ रखा है। मतलब यह कि आप बाहर हंसते रहते हैं, कभी हिम्मत नहीं हारते, लेकिन घर लौटने के बाद उदासी, निराशा आपको घेर लेती है, भूख नहीं लगती, मन उचटा सा रहता है। अचानक से आत्महत्या करने का मन करने लगता है।
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उपचार : इलाज में हिचक कैसी, डॉक्टर को दिखाइए जरूर
डॉ. नेहा आनंद कहती हैं कि सबसे पहले तो स्वीकार करने की हिम्मत जुटाइए। रही बात शेयर करने की तो दोस्तों, रिश्तेदारों के बजाय प्रोफेशनल साइक्रेटिस्ट को दिखाएं। इससे आपके बारे में जानकारी लीक होने की गुंजाइश बिल्कुल भी नहीं होगी। तीसरी चीज कि यह आपको मानना होगा कि यदि आपकी सोच आत्महत्या तक पहुंच गई है तो आपको साइकोलॉजिकल मदद की जरूरत है। कई तरह की थेरेपी हैं, जो आपको अवसाद से निकालने में मदद करेगी। मेडिटेशन, योग, एक्सरसाइज नियमित रूप से कुछ न कुछ करते रहें। अपने चारों तरफ सकारात्मक सोच वाले लोगों को रखें।
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