किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में डेंगू के गंभीर मरीजों के लिए क्रिटिकल केयर यूनिट बनाने का प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया है।
ये यूनिट केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर में स्थापित की जानी थी। इसके लिए बजट राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) और नेशनल वेक्टर बर्न डिजीज प्रोग्राम (एनवीबीपी) से दिया जा रहा था।
लेकिन बीते एक साल से ये प्रस्ताव ठंडे बस्ते में है। न तो एनआरएचएम के अधिकारी इस विषय में कुछ बोल रहे हैं और न ही केजीएमयू के। राजधानी में रविवार को ही डेंगू से पीड़ित कई मरीजों का पता चला था।
डेंगू की दस्तक के साथ ही स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के भी कान खड़े हो गए थे। डेंगू की गंभीर अवस्था हेमरेजिक फीवर से पीड़ित मरीजों के इलाज के लिए क्रिटिकल केयर यूनिट (सीसीयू) होना जरूरी है।
आमतौर पर मच्छर के काटने से होने वाले डेंगू के इलाज के लिए मरीज को प्लेटलेट चढ़ाना जरूरी हो जाता है। इसके लिए उसे अस्पताल में भर्ती होना जरूरी है।
ये परिस्थिति तब आती है जब मरीज के रक्त में प्लेटलेट की संख्या घट कर 10 हजार क्यूबिक मिलीमीटर से कम हो जाती है।
वहीं डेंगू हेमरेजिक फीवर में अचानक तेज बुखार आना, सिर में सामने की तरफ दर्द होना, आंखों में पीछे तेज दर्द मांसपेशियों व जोड़ो में तेज दर्द, छाती व बांहों पर लाल चकत्ते हो जाते हैं।
अगर इन लक्षणों के साथ ही नाक, मुंह तथा मसूड़ों अथवा मल और पेशाब में खून आने लगे तथा पेट में लगातार तेज दर्द हो तो मरीज की स्थिति को गंभीर माना जाता है। ऐसी स्थिति में सही इलाज न मिले तो मरीज की मौत भी हो सकती है।
इन्हीं परिस्थितियों से निपटने के लिए एनआरएचएम ने एक योजना बनाई थी। इसमें केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर में एक क्रिटिकल केयर यूनिट स्थापित की जानी थी। इसके लिए 80 फीसदी बजट एनआरएचएम और 20 फीसदी बजट एनवीबीपी योजना से दिया जाना था।
लेकिन इस योजना का क्या हाल है इसकी जानकारी देने वाला कोई नहीं है। गौरतलब है कि 2010 में राजधानी लखनऊ के खदरा इलाके में डेंगू से 50 अधिक मौतें हुई थी।
इस दौरान डेंगू-मलेरिया की निगरानी, इलाज और नियंत्रण में काफी कमियां मिली थी। इसी के बाद क्रिटिकल केयर यूनिट को बनाने की योजना बनायी गई थी।