करोड़ों रुपये के लैकफेड घोटाले के आरोपी तथा एनआरएचएम घोटाले में गाजियाबाद की डासना जेल में बंद पूर्व मंत्री बाबूसिंह कुशवाहा को सुनवाई के दौरान पेश न किए जाने को लेकर अदालत की नाराजगी यूं ही नहीं है।
अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि बाबूसिंह की जेल अधीक्षक से साठगांठ है तथा इसी के चलते जेल अधीक्षक उन्हें कोर्ट में पेश नहीं कर रहे हैं।
कई बार रसूखदार जेल में लाए जाने के साथ ही बीमार होने के बहाने से आम कैदियों की तरह बैरक में रहने के बजाय जेल अस्पताल में भर्ती हो जाते हैं।
जेल अधिकारियों व डॉक्टरों की मिलीभगत से ऐसे रसूखदार अपराधी न सिर्फ मनमाने तरीके से जेल अस्पताल में रहते हैं बल्कि सभी सुविधाओं का लाभ उठाते हुए अपना काम करते रहते हैं।
मुख्तार अंसारी सहित कइयों ने की मनमानी
मुख्तार अंसारी, बृजेश सिंह, मुन्ना बजरंगी, त्रिभुवन जैसे तमाम माफिया व अपराधी ऐसे हैं, जिनके बारे में पुलिस व प्रशासन के अधिकारियों को पुख्ता जानकारी है कि जेल में रहने के बावजूद विभिन्न विभाग के ठेकों में उनका दखल जारी है।
जेल से ही वे संबंधित अधिकारियों व अपने गुर्गों से बात कर अपना व अपने लोगों के काम मैनेज कर रहे हैं। इस तरह की शिकायतें पूर्व में एसटीएफ के पास भी पहुंची थीं लेकिन कोई नकेल नहीं कसी जा सकी।
जानकारों के मुताबिक ऐसे लोगों व जेल अधिकारियों की मिलीभगत का गठजोड़ ऐसा है, जो अपराधियों के लिए सब कुछ संभव कर रहा है।
चाहे वह उनके जेल अस्पताल अथवा जिला अस्पताल में भर्ती कराने की जुगत हो या फिर राजधानी के किसी नामी व स्पेशियलिटी वाले अस्पताल में भर्ती होने का मामला, सब कुछ मैनेज हो रहा है।
केस 1- नंद गोपाल नंदी
जुलाई 2012 में पूर्व मंत्री नंद गोपाल गुप्त नंदी पर जानलेवा हमला करने के आरोप में नैनी जेल में बंद सपा के बाहुबली विधायक विजय मिश्र स्वास्थ्य खराब होने के नाम पर लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल में भर्ती हुए थे।
इसको लेकर खासी चर्चा हुई थी। जिस तकलीफ का हवाला देकर विजय मिश्र को जेल अधिकारियों ने लखनऊ भेजा था, उसकी बलरामपुर अस्पताल और पीजीआई दोनों ने ही पुष्टि नहीं की थी।
बल्कि इस दौरान विजय मिश्र लखनऊ में न सिर्फ मंदिरों में दर्शन करते देखे गए बल्कि राजनीतिक हलके में अपने परिचितों के यहां भी आते-जाते रहे।
केस 2- सीएम की पार्टी के लिए तोड़े नियम
2012 में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी के सम्मान में मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव की ओर से दिए गए भोज-समारोह में दो ऐसे बाहुबली शामिल हुए जो विधानसभा के सत्र में शामिल होने के नाम पर जेल से न्यायिक अभिरक्षा में लखनऊ लाए गए थे। नियमानुसार इन्हें सत्र में शामिल होने के बाद वापस जेल में या जेल चिकित्सक द्वारा रेफर किए गए अस्पताल में भर्ती कराया जाना चाहिए था। इन दोनों की समारोह में मौजूदगी से मुख्यमंत्री को असहज स्थिति का सामना करना पड़ा था। इसे लेकर काफी चर्चा भी हुई थी और विपक्षी दलों ने सपा को आड़े हाथ लिया था।
केस 3- मुख्तार पर भी है मनमानी का आरोप
जेल में सुविधाएं न मुहैया कराने वाले जेल अधिकारी एसके पुंडीर को जान से मारने की धमकी देने का भी मामला माफिया मुख्तार अंसारी पर चल रहा है।
इस मामले में मुख्तार के खिलाफ 1999 में मुकदमा दर्ज हुआ था, लेकिन सूबे की अधिकतर जेलों में मुख्तार के नाम की गूंज होने का फायदा उसके तमाम शागिर्दों को मिल रहा है।
मुख्तार अंसारी पर भी बीमारी के नाम पर जेल या जिला अस्पताल में भर्ती होते रहने का आरोप है। वे पूर्व में कई बार बीमारी के नाम पर लखनऊ के किसी न किसी अस्पताल में भर्ती होते रहे हैं।
केस 4- अमरमणि त्रिपाठी ने भी किया खेल
कवयित्री मधुमिता हत्याकांड में जेल में निरुद्ध पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी भी शुरुआती दौर में अपने मामले को मैनेज करने के लिए कभी जेल अस्पताल तो कभी दूसरी जेल आते-जाते रहे।
उनके रसूख के आगे जेल प्रशासन नतमस्तक रहा। अमरमणि ने जेल में रहने के दौरान ही अपने केस को हल्का करने, गवाहों को धमकाने व अपने पक्ष में फर्जी गवाह खड़ा करने की कोशिश की। जेल से उन्हें इस बाबत पूरा सहयोग मिलता रहा।
सब तय होता है
माफिया और दबंगों के बाहुबल व धनबल के आगे जेल अधिकारी नतमस्तक रहते हैं। सब तय रहता है कि किस सुविधा के लिए कितना देना होगा।
वहीं, कभी-कभी जेल अधिकारियों के सामने भी दिक्कत होती है। ऐसे कई वाकये हो भी चुके हैं जब माफिया से टक्कर लेने पर जेल अधिकारी को दिन-दहाड़े मार दिया गया।
इस व्यवस्था में सुधार के लिए जिलों में डीएम व एसपी और जेल मुख्यालय के अधिकारियों को समय-समय पर औचक जांच करते रहना चाहिए। उनके निरीक्षण की सूचना लीक नहीं होनी चाहिए जैसा कि अमूमन होता है।
- केएल गुप्ता, पूर्व डीजीपी