मुकदमा वापस करने या उसमें फंसा देने के नाम पर आरोपियों से उगाही करने का नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) के कुछ अफसरों का पुराना इतिहास है।
इसीसे सीबीआई की एंटी करप्शन शाखा की निगाहें ब्यूरो के अधिकारियों-कर्मचारियों पर टिकी रहती हैं। एनसीबी के सुपरिंटेंडेंट स्तर के अधिकारी को एक प्रतिष्ठित रेस्टोरेंट में तमाम लोगों के सामने सीबीआई ने ऐसे ही नहीं दबोच लिया।
दरअसल सीबीआई इस सुपरिंटेंडेंट की करतूतों पर पहले से नजर रखे हुए थी। उसके पास एनसीबी के कुछ अधिकारियों के खिलाफ लगातार शिकायतें आ रही थीं।
नशीली व प्रतिबंधित दवाओं के विक्रेताओं के खिलाफ पिछले महीने की गई कार्रवाई के मामले को हल्का करने के लिए डील होने की भी सीबीआई को शनिवार को जानकारी मिली थी।
सीबीआई ने 2010 के अंत में एनसीबी के ही एक सुपरिंटेंडेंट दिवाकर त्रिपाठी को उसके एक मातहत समेत गिरफ्तार किया था। एनसीबी के यह अधिकारी ब्यूरो के ऑफिस के बाहर ही एक कार में बैठ कर डील कर रहे थे।
त्रिपाठी व उनके सहयोगी बाराबंकी के एक व्यक्ति को एनडीपीएस एक्ट में फंसाने की धमकी देकर पैसे की मांग कर रहे थे। जिस शख्स को धमकाया जा रहा था उसे एनसीबी ने एनडीपीएस एक्ट में जेल भेजा था और वह जमानत पर जेल से बाहर आ चुका था।
बिचौलिये के जरिये एनसीबी के अधिकारी को सेट करने का खेल होता है। हालांकि, कभी-कभी एनसीबी के अधिकारी सीधी ही डील कर लेते हैं।
बिचौलिये से बात तय हो जाने के बाद अधिकारी और डील करने वाली पार्टी की किसी होटल या रेस्टोरेंट में मीटिंग होती है। कभी-कभी ये मीटिंग चलती कार में भी हो जाती है।
डील का भी अपना नियम-कानून है। डील एडवांस (पेशगी) लेने के बाद ही फाइनल मानी जाती है। डील के समय ही यह तय होता है कि रकम कब और किस तरह दी जानी है। इसी दौरान तय होता है कि वे क्या चीजें की जाएंगी जिसके आधार पर आरोपी अदालत से राहत पा सके।
अभी तक की पड़ताल में विवेचक की भी साठगांठ भी सामने आ रही है। दरअसल विवेचक के बिना केस डायरी में मामले को हल्का किए आरोपी को अदालत में राहत नहीं पहुंचाई जा सकती।