फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

आरोपी की जमानत के बाद भी जेल अफसर ने आरोपी को रिहा करने से किया इनकार, कोर्ट ने कहा- क्यों न आपके खिलाफ वैधानिक कार्यवाही की जाए

विज्ञापन
विज्ञापन
लखनऊ। किसी अपराधी को जेल में रखने के लिए कोर्ट से जारी वारंट की जरूरत होती है। बिना वारंट के किसी को न तो जेल में रखा जा सकता है और न ही कोर्ट में पेशी ही हो सकती है लेकिन दुराचार के मामले में जेल में बंद आरोपी की जमानत हो जाने के बाद कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के आरोपी विशाल की रिहाई जेल भेजी तो जेल अधिकारियों ने आरोपी को जेल से छोड़ने से मना करते हुए कोर्ट से कहा कि वारंट खो गया है, दूसरा वारंट दीजिए तब आरोपी को छोड़ा जाएगा। इस पर कोर्ट ने जेल अधीक्षक को नोटिस जारी कर तलब करते हुए स्पष्टीकरण मांगा है कि क्यों न उनके खिलाफ वैधानिक कार्यवाही की जाए। मामले की अगली सुनवाई 18 अगस्त को होगी।
विज्ञापन

पत्रावली के अनुसार, पॉक्सो एक्ट के विशेष न्यायाधीश महेश चंद वर्मा की कोर्ट में नगराम थाने से संबंधित दुराचार और पॉक्सो एक्ट के आरोपी विशाल भारती का मामला लम्बित है और आरोपी विशाल भारती इस मामले में 18 मई 2019 से जिला कारागार में निरुद्ध है। उसकी जमानत हो जाने पर कोर्ट ने चार अगस्त को आरोपी की रिहाई आदेश को जेल भेजते हुए आरोपी को रिहा करने का आदेश दिया। कोर्ट के आदेश पर आरोपी को रिहा तो नहीं किया गया लेकिन जिला जेल के वरिष्ठ अधीक्षक ने कोर्ट में रिहाई आदेश वापस भेजते हुए अपनी रिपोर्ट देकर बताया कि आरोपी विशाल का अभिरक्षा वारंट कोर्ट में उसे पेश करने के लिए आने जाने में पुलिस एस्कॉर्ट द्वारा कहीं खो गया है। लिहाजा उसे रिहा नहीं किया जा सकता। कोर्ट द्वारा आरोपी के अभिरक्षा वारंट की द्वितीय प्रति निर्गत की जाए जिससे उसकी रिहाई के संबंध में कार्यवाही की जा सके।
इस पर कोर्ट ने कोर्ट मुहर्रिर मनीष तिवारी से पूछा तो उन्होंने बताया कि अभिरक्षा वारंट के बिना जेल में आरोपियों का प्रवेश नहीं किया जाता है और जब न्यायालय में पेशी होती है तो अभिरक्षा वारंट के साथ आरोपी की पेशी होती है। ऐसी स्थिति में वरिष्ठ जेल अधीक्षक लखनऊ द्वारा दिया गया बयान कि उक्त अभिरक्षा वारंट अदालत आने जाने में पुलिस एस्कॉर्ट द्वारा कहीं खो गया है, पूर्णत: असत्य प्रतीत होता है।
विज्ञापन

अदालत ने कोर्ट मुहर्रिर के बयान के आधार पर वरिष्ठ जेल अधीक्षक को नोटिस जारी कर आगामी 18 अगस्त के लिए न्यायालय तलब कर पूछा है कि उनके द्वारा किया गया उक्त कथन क्या जानबूझकर अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए किया गया है। क्या बिना अभिरक्षा वारंट के किसी आरोपी को न्यायालय से पेशी से वापस जाने पर जेल में प्रवेश ले लिया जाता है। तीसरा प्रश्न यह पूछा है कि यदि उनके द्वारा न्यायालय के समक्ष किया गया कथन असत्य है तो क्यों ना उनके विरुद्ध वैधानिक कार्यवाही की जाए। अदालत ने इसी के साथ.साथ अभियुक्त की तुरंत रिहाई का आदेश देते हुए अभिरक्षा वारंट की द्वितीय प्रति भेजे जाने का निर्देश दिया है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें