मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यश भारती सम्मान की जांच कराए जाने की घोषणा की तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। पिछली अखिलेश सरकार ने यश भारती को लेकर जो दरियादिली दिखाई थी, नियमावली की जिस प्रकार उपेक्षा की जाती रही, वरिष्ठ-कनिष्ठ का कोई मापदंड नहीं रखा गया, उसने उन्हें विवादित कर दिया था।
यह तो माना ही जा रहा था कि अगर प्रदेश में कोई दूसरी सरकार आई तो इस पर सवाल जरूर उठेंगे। सपा सरकार ने कई प्रसिद्ध, योग्य और दिग्गज लोगों को यश भारती दिए। वहीं, कई ऐसे लोगों को भी ये सम्मान दे दिए गए, जो योग्यता में उतने श्रेष्ठ नहीं थे।
संस्कृति विभाग ने नियमावली में राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय ख्याति का मानदंड रखा था, समिति के जरिये नामों की छंटनी का प्रावधान किया था, लेकिन इन्हें दरकिनार किया जाता रहा। समारोह से एक रात पहले की कौन कहे, मंच पर ही इनकी घोषणा की जाने लगी तो इसका मजाक भी बना।
रही-सही कसर पेंशन की घोषणा ने पूरी कर दी थी। जब क्रिकेट और सिनेमा से करोड़ों की कमाई करने वालों को भी 50 हजार की पेंशन दी जाने लगी। यश भारती के खूब समारोह किए गए।
वर्ष 2016 में चार बार समारोह आयोजित कर 131 लोगों को यश भारती बांट दिए गए। इसके पहले 2015 में वर्ष 2013 और 2014 के लिए कुल 55 यशभारती दिए गए।
ग्राम प्रधान तक को भी दे दिया यश भारती
अखिलेश यादव
तत्कालीन सपा सरकार ने दर्शन सिंह यादव को इसलिए यश भारती दे दिया गया कि वे सैफई के ग्राम प्रधान थे। कई वरिष्ठ साहित्यकारों को यश भारती नहीं मिले, वहीं सपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के गुरु और उन पर ‘क्रांतिदूत मुलायम’ पुस्तक लिखने वाले रामसिंह यादव को सम्मान दिया गया।
यश भारती को लेकर सबसे चटखारे लेकर सुनाया जाने वाला किस्सा वह है, जब यश भारती के सम्मान समारोह में मंच संचालन कर रहीं अर्चना सतीश ने तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को एक चिट दिया और फिर उनके नाम की भी घोषणा कर दी गई।
उसी समारोह में एक और संचालिका शिखा का नाम भी यश भारती से सम्मानित होने वालों में शामिल था। सेंटर फॉर सिविल लिबर्टीज ने यश भारती पुरस्कार के विरोध में इलाहाबाद हाईकोर्ट के लखनऊ बेंच में याचिका दायर की है।
सेंटर की अधिवक्ता नूतन ठाकुर ने आरोप लगाया कि पुरस्कारों के लिए किसी भी नियम का पालन नहीं किया जा रहा है और और इन्हें केवल भाई-भतीजावाद में दिया जा रहा है।
अंतिम समय तक पुरस्कार पाने वालों के नाम बताए जाते हैं और उन्हें मनमाने ढंग से चुना जा रहा है, जो स्पष्ट रूप से अनुचित और शासकीय धन का दुरुपयोग है।
उन्होंने कोर्ट में प्रार्थना की कि एक रिटायर्ड हाई कोर्ट जज की अध्यक्षता में जांच कमेटी बना कर वर्ष 2012 से 2016 के बीच दिए गए सभी यश भारती पुरस्कारों की समीक्षा कराई जाए और गलत ढंग से पुरस्कार पाए लोगों से इसे वापस लिया जाए।
पेंशन पर अमिताभ बच्चन ने जताया था विरोध
अमिताभ बच्चन
फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन ने यश भारती से सम्मानित लोगों को 50 हजार रुपये मासिक पेंशन दिए जाने का विरोध किया था। उन्होंने अपनी और अपने परिवार के पेंशन को यह कहते हुए लौटा दिया कि इसे जरूरतमंद और गरीबों पर खर्च किया जाए।
अमिताभ बच्चन के विरोध के बाद तत्कालीन सरकार ने यह घोषणा की कि उन्हें ही पेंशन दी जाएगी, जो आवेदन करेंगे। बता दें, पिछली सरकार में जब अमिताभ के बेटे अभिषेक बच्चन को यश भारती दिया गया था, तब भी विवाद उठे थे।
बाद में उन्होंने सम्मान से मिली धनराशि हिंदी संस्थान को हरिवंश राय बच्चन की स्मृति में पुरस्कार देने के लिए दान कर दी थी। यश भारती सम्मान को लेकर राजधानी के कलाकारों ने सामूहिक तौर पर आपत्ति जताई थी।
शास्त्रीय गायक रामेश्वर प्रसाद मिश्र एवं धर्मनाथ मिश्र, उपशास्त्रीय गायिका सुनीता झिंगरन, तबलावादक इलमास हुसैन, कव्वाली गायक हैदर बख्श, कथक नृत्यांगना सुरभि सिंह ने प्रेस क्लब में पत्रकार वार्ता कर यश भारती पर सवाल उठाए और कहा कि यश भारती सम्मान देने में वरिष्ठता और योगदान को नजरअंदाज किया गया है।
बार-बार सूची जारी किया जाना, गलत नाम आना, आखिरी समय तक नाम जोड़े जाना, इससे पूरी प्रक्रिया को संदेह के घेरे में आता है। संस्कृति विभाग को यश भारती बांटने के लिए लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) से कर्ज भी लेना पड़ा था।
हुआ यह कि पिछले वित्तीय वर्ष में सम्मान के लिए बजट में आवंटित धनराशि सम्मानित लोगों की अधिक संख्या के कारण कम पड़ गई, इसके चलते विभाग को एलडीए से पांच करोड़ रुपए कर्ज लेने पड़े थे।
यश भारती पाने वालों में भाजपा वाले भी
डेमो
यश भारती से सम्मानित लोगों को पेंशन देने की घोषणा करते हुए तत्कालीन सपा सरकार ने कोई लक्ष्मण रेखा नहीं खींची, इसके चलते उन्हें भी पेंशन मिलनी शुरू हो गई जो क्रिकेट, सिनेमा जैसे माध्यमों में रहकर करोड़ों रुपये कमा रहे हैं।
इतना ही नहीं, विभिन्न विश्वविद्यालयों, संस्थानों से पेंशन पाने वालों को भी यह पेंशन मिलनी शुरू हो गई। संस्कृति विभाग के अनुसार, करीब 180 लोगों को पेंशन दी जा रही है, इनमें प्रसिद्ध अभिनेता एवं पूर्व सांसद राज बब्बर, प्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी मो. कैफ और सुरेश रैना, फिल्म अभिनेता जिमी शेरगिल, उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष एवं सपा सरकार द्वारा कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त प्रसिद्ध गीतकार गोपालदास नीरज, लखनऊ विवि के सेवानिवृत्त प्रोफेसर एवं रंगकर्मी राज बिसारिया, कला महाविद्यालय के सेवानिवृत्त प्राचार्य एवं वरिष्ठ चित्रकार जयकृष्ण अग्रवाल, मैनपुरी के नेशनल कॉलेज में विभागाध्यक्ष रहे गीतकार सोम ठाकुर जैसे साधन संपन्न तथा कहीं और से पेंशन पाने वाले शामिल हैं।
पिछली सरकार में मुख्य सचिव रहे आलोक रंजन की गायिका पत्नी सुरभि रंजन को यश भारती देने पर भी अंगुलियां उठीं। समाजसेवी नूतन ठाकुर की आरटीआई से पिछले दिनों यह भी खुलासा हुआ कि तत्कालीन संस्कृति सचिव हरिओम ने अपनी गायिका पत्नी मालविका हरिओम को भी यश भारती दिलाने का प्रयास किया था, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल सकी।
भले ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यश भारती पुरस्कारों के वितरण की जांच कराने की घोषणा की हो। पर, ऐसा नहीं है कि समाजवादी पार्टी की सरकार द्वारा शुरू किए गए इन पुरस्कारों से सिर्फ सपा से संबंधित लोगों को ही नवाजा गया है।
पुरस्कार पाने वालों में भाजपाई भी शामिल हैं। इनमें सबसे प्रमुख नाम भाजपा के मीडिया प्रभारी रह चुके नरेंद्र राणा का है। इनके अलावा भी कुछ ऐसे लोगों को यह पुरस्कार मिला है, जो अब भाजपा में है।
इस बीच, नरेंद्र राणा ने कहा कि मुख्यमंत्री की मंशा उन लोगों की जांच कराने की है जो दोहरा लाभ ले रहे हैं। जिन्हें मानक के आधार पर यह पुरस्कार मिला है, उनकी जांच की बात नहीं कही गई है।