भाजपा में इन दिनों जो घमासान चल रहा है, वह कोई नई बात नहीं है।
बात की शुरुआत 2007 में हुए विधानसभा चुनाव से। ऐसा लग रहा था कि भाजपा 150 के आंकड़े को जरूर छू लेगी।
नतीजे आए तो सीटें 88 से सिमटकर 51 पर आ गईं। कल्याण की टिप्पणी आई, ‘दूसरों ने नहीं हमें अपनों ने हराया है। दलबदलुओं को तवज्जो दिए पर कार्यकर्ता नाराज हो गए।’
फिर अटल बोले और आडवाणी भी
2004 लोकसभा चुनाव में भारत उदय यात्रा (इंडिया शाइनिंग) निकाल चुकी भाजपा आश्वस्त थी कि देश की जनता उसे पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का अवसर देने जा रही है।
चुनाव हुए तो यूपी में ही सीटों का आंकड़ा महज 10 पर सिमट गया। अटल बिहारी वाजपेयी की टिप्पणी आई, ‘अति उत्साह हमें आत्महत्या की तरफ ले गया।’
2009 के लोकसभा चुनाव में भी यही कहानी दुहराई गई। लालकृष्ण आडवाणी बोले, ‘हम हिट विकेट होते हैं। इस कमजोरी से छुटकारा पाए बगैर अपेक्षित नतीजे लाना मुश्किल है।’
फैसले से डरे कार्यकर्ता
2012 के विधानसभा चुनाव में भी यही सब हुआ। वजह मोदी हों या कांग्रेस नेतृत्व वाली केंद्र सरकार से लोगों की उकताहट।
भाजपा चुनावी परिदृश्य देख उत्साह में है। उसने लोकसभा की 272 प्लस सीटें हासिल करने का वह सपना सजा लिया है जो राम जन्मभूमि आंदोलन से बने माहौल में भी साकार नहीं हो पाया।
पर जिस तरह सोनू सिंह, बृजभूषण शरण सिंह, फागू चौहान, चौधरी बाबूलाल जैसे चेहरों की भाजपा में एंट्री शुरू हुई है, आम कार्यकर्ताओं को पार्टी नेताओं का फैसला डराने लगा है।
उसे अतीत की घटनाएं याद आने लगी हैं। तब इन्हीं सब के चलते पार्टी के पक्ष में बना-बनाया माहौल ऐसा बिगड़ा कि कुछ करते ही नहीं बना था।
अटल बोले, उधार के सिंदूर से नहीं कटती जिंदगी
2002 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का चुनावी माहौल कल्याण के विरोध व राजनाथ से उनकी जंग की भेंट चढ़ गया।
2004 के लोकसभा चुनाव के वक्त भी माहौल भाजपा की तरफ झुकता दिख रहा था कि अचानक बाहुबली डीपी यादव पार्टी में प्रकट हो गए।
अटल बिहारी वाजपेयी ने हस्तक्षेप किया और चुटकी ली, ‘यह नए जमाने के नए नेताओं का फैसला है, जिन्हें अपने और अपनों से ज्यादा दूसरों पर भरोसा है।
पर, उधार के सिंदूर से जिंदगी नहीं कटती।’ आखिरकार डीपी यादव से भाजपा ने पल्ला झाड़ा।
2012 में भी यही खेल, दागियों से मिलाया हाथ
भाजपा ने चुनाव जीतने को काफी तैयारियां की थीं। उमा को मोर्चा में लगाया तो संजय जोशी को लखनऊ में बैठाया।
माहौल ऐसा दिखने लगा कि सूबे में कमल खिलने जा रहा है। उत्साहित नेताओं ने प्रयोग शुरू कर दिए।
जो बाबू सिंह कुशवाहा और बादशाह सिंह भाजपा के लिए खलनायक थे, वे रातों-रात भाजपा में प्रकट हो गए। अवधेश वर्मा और दद्दन मिश्र जैसे लोग बसपा से टिकट कटने से पहले ही भाजपा का टिकट पा गए।
भाजयुमो के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष रामाशीष राय ने विरोध किया तो पार्टी से बाहर कर दिए गए। आईपी सिंह विरोध में उतरे तो वे भी निलंबित कर दिए गए।
ये फैसले भी बने आत्मघाती
2012 विस चुनाव में पार्टी ने पहले कहा, सत्ता में आए तो मुस्लिम आरक्षण को बढ़ावा देने वाले फैसले रद्द कर देंगे।
लेकिन पहले चरण का मतदान नजदीक आते-आते भाजपा नेताओं को पता नहीं क्या सूझा कि वे मुस्लिमों की सुरक्षा की गारंटी का राग अलापने लगे।
दृष्टिपत्र में त्रि-भाषा फॉर्मूले का जिक्र कर उर्दू को लेकर इतने दावे कर डाले कि पार्टी कार्यकर्ताओं के एक बड़े वर्ग ने यह सवाल उठा दिया कि क्या अटल बिहारी वाजपेयी का इस पर विरोध अनुचित था?
ऐसी भद्द पिटी की सीटों का आंकड़ा 51 के बजाय 47 पर अटक गया।
कंधार पर छिड़ी वार
लोस चुनाव 2009 में कंधार जाकर आतंकियों को छोड़ने के मामले पर भाजपा की कलह सड़क पर आ गई।
लालकृष्ण आडवाणी बोले कि जिस बैठक में फैसला किया गया, उसमें वे शामिल नहीं थे। जसवंत सिंह खुलकर सामने आ गए और कहा कि बैठक में आडवाणी मौजूद थे।
यही नहीं अशोक प्रधान को बुलंदशहर से चुनाव लड़ाने पर पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह और पूर्व सीएम कल्याण सिंह के बीच भी जंग छिड़ी। आखिरकार आपस में लड़ती भाजपा चुनाव हार गई।