जयंत ने कहा कि लगता है कि सरकार में शीर्ष स्तर पर इन विधेयकों को लागू करने का अनैतिक दबाव था, जिसे कृषि सुधार का नाम दिया जा रहा है। शहंशाह का मूड था, उन्होंने नए कानून का एलान कर दिया। कृषि राज्य का विषय है। एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केटिंग कमेटी (एपीएमसी) एक्ट राज्य का है, केंद्र इसमें दखल दे रहा हैं। इसे कानूनी तौर पर चुनौती दी जा सकती है।
एमएसपी की कानूनी गारंटी जरूरी:
रालोद नेता ने कहा कि किसान मंडी के भीतर उत्पाद बेचेगा तो मंडी शुल्क लगेगा। मंडी के बाहर बेचने पर शुल्क नहीं लगेगा। मंडियां खत्म होती चली जाएंगी। ऐसे में यदि किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी नहीं होगी तो उसके लिए घातक परिणाम होंगे।
नए विधेयक में एमएसपी का जिक्र नहीं है। प्रधानमंत्री मौखिक तौर पर कह रहे हैं कि एमएसपी लागू रहेगा। उन्होंने 14 दिन के भीतर गन्ना मूल्य भुगतान समेत मौखिक तौर पर कितने वादे किए, क्या इनमें कोई पूरा हुआ? आवश्यक वस्तु अधिनियम से कृषि उत्पादों को अलग कर दिया गया है। इससे कालाबाजारी बढ़ेगी।
एक बड़ा प्रावधान यह है कि यदि किसान और खरीददार के बीच विवाद होगा तो उसकी सुनवाई उपजिलाधिकारी (एसडीएम) करेगा। मौजूदा सिस्टम में सभी जानते हैं कि एसडीएम किसके हक में फैसला देगा? लगता है सरकार ने दो-चार बड़े कारपोरपेट घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए विधेयक में प्रावधान कराए हैं।