सपा-बसपा गठबंधन के एलान के बाद यूपी में कांग्रेस के लिए कोई खास विकल्प नहीं बचे हैं। यही वजह है कि पार्टी हाईकमान ने यहां एकला चलो की नीति के साथ आगे बढ़ने का फैसला किया है। हालांकि, पार्टी नेतृत्व ने मंडल या जिला स्तर पर सक्रिय छोटे-छोटे दलों को अपने से जोड़ने की योजना भी बनाई है, ताकि मत प्रतिशत के साथ-साथ सीटें भी बढ़ाई जा सकें।
कांग्रेस हाईकमान को पूरी उम्मीद थी कि यूपी में होने वाले गठबंधन में सपा-बसपा उसे जरूर साथ लेंगी। छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान के चुनाव के बाद सपा-बसपा और कांग्रेस के रिश्तों में खटास तो आई थी, पर कुछ दिनों पहले तक गठबंधन के इस तरह से एकतरफा घोषणा किए जाने के आसार कांग्रेस को नहीं लग रहे थे।
सपा-बसपा नेतृत्व मानता है कि जो स्थिति छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान के चुनाव में उनकी पार्टी की थी, वही स्थिति यूपी में कांग्रेस की है। जब वहां कांग्रेस ने गठजोड़ नहीं किया तो अब लोकसभा चुनाव में उन्हें भी कांग्रेस को साथ मिलाने की जरूरत नहीं है। वैसे भी यूपी में कांग्रेस को 3-4 फीसदी वोट मिलता है। कांग्रेस प्रत्याशी के मैदान में न होने पर ये मतदाता भाजपा के पक्ष में जाएंगे, जोकि सपा-बसपा के लिए ठीक नहीं।
इन सब स्थितियों के बीच कांग्रेस नेतृत्व ने अगले 15 दिनों के भीतर अपने संगठन को और अधिक मजबूत किए जाने का फैसला किया है। कांग्रेस के यूपी प्रभारी गुलाम नबी आजाद और प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर रविवार से लखनऊ में मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कार्यकर्ताओं से मिलने का सिलसिला शुरू करेंगे।
सपा-बसपा के गठबंधन पर आज हम कोई प्रतिक्रिया नहीं देंगे। रविवार को लखनऊ में इस बारे में अपनी स्पष्ट राय देंगे। उससे पहले अगर कोई कांग्रेस का नेता या कार्यकर्ता गठबंधन को लेकर कुछ कहता है, तो यह पार्टी की राय न होकर उसकी निजी राय होगी।
-गुलाम नबी आजाद, यूपी कांग्रेस प्रभारी