सपा सरकार गिराने के लिए उसके 70 विधायकों से संपर्क का दावा करने वाली भाजपा विधान परिषद में अपने दूसरे उम्मीदवार को जिताने के लिए 22 विधायकों का समर्थन भी नहीं जुटा सकी।
ऐसे में बड़बोले पार्टी नेतृत्व को लेकर सवाल उठने लगे हैं। सवाल यह भी है कि क्या इन्हीं हवा हवाई दावों के बीच भाजपा 2017 में इतिहास रचने का दम भर रही है?
राजनीतिक समीक्षकों की नजर में सूबे के भाजपा नेता ऐसी ही राह पर चलते रहे तो 2017 के चुनाव में उनके सामने अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने की बड़ी चुनौती होगी। विधानसभा कोटे से विधान परिषद की 12 सीटों के चुनाव नतीजे ने इसके संकेत भी दे दिए हैं।
बसपा को अपने कोटे से आठ मत ज्यादा मिलना यह साबित करता है कि क्रास वोटिंग करने वाले विधायकों की नजर में सपा का विकल्प भाजपा नहीं बसपा है। तभी तो उन्होंने भाजपा के बजाय बसपा की ओर रुख किया। इस तथ्य को समझने में भाजपा नेताओं व रणनीतिकारों से भारी चूक हुई है।
...तो खत्म हो जाएगा आमचुनाव में जीत का असर
बात सही भी है। परिषद चुनाव के नतीजों का बारीकी से विश्लेषण करें तो यह बात और ज्यादा स्पष्ट हो सकती है। पार्टी के पास अपने एक उम्मीदवार को जिताने के बाद सिर्फ नौ वोट ही ज्यादा थे।
पार्टी के भीतर से ही यह आवाज उठने लगी है कि दूसरा उम्मीदवार उतारने के पहले इस बारे में पूरी छानबीन कर लेनी चाहिए थी। अगर वोटों का इंतजाम नहीं था तो दूसरा प्रत्याशी नहीं उतारते।
बगैर ठोस संभावनाओं के प्रत्याशी उतारने से उम्मीदवार तो हारा ही, रणनीतिक भद्द ऊपर से पिटी। पूरी भाजपा कठघरे में खड़ी हो गई। भले ही राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और प्रदेश प्रभारी ओम माथुर चुनाव से दूरी बनाए रखे हों लेकिन जवाबदेही से वह भी नहीं बचे हैं।
यह चर्चा भी शुरू हो गई कि भाजपा का ग्राफ वैसा नहीं रहा जैसा लोकसभा चुनाव के वक्त था। जाहिर है, भाजपा नेता बाज न आए तो विधानसभा चुनाव आते-आते लोकसभा चुनाव की जीत का असर खत्म हो जाएगा।
सामने आई पार्टी की खींचतान
भाजपा नेता अब भी सबक लेते नहीं दिखते। सच स्वीकार करने को तैयार नहीं है। तर्क दिए जा रहे हैं कि भाजपा को दूसरे दलों के 10 विधायकों का समर्थन मिला है लेकिन सच इसके उलट है।
पार्टी को पांच विधायकों का समर्थन तो पहले से ही प्राप्त था। उदाहरण के लिए अपना दल के एक विधायक सहित चंदौली, गोरखपुर व बसपा के दो सदस्य पहले से ही भाजपा के संपर्क में थे।
ऐसे में भाजपा को सिर्फ पांच वोट अन्य स्थानों से मिले हैं। पर, वाहवाही लूटने के चक्कर में भाजपा इस तथ्य से मुंह फेर रही है। अति उत्साही फैसलों से पार्टी की पहचान व साख को भी धक्का पहुंच रहा है।
नेता कुछ भी कहें लेकिन यह साफ हो गया है कि कहीं न कहीं पार्टी के भीतर संवादहीनता व खींचतान पहले जैसी ही है। वरना क्या कारण रहा कि दूसरा प्रत्याशी खड़ा करने के बाद नेता उसे जिताने की चिंता करते नहीं दिखे। केंद्रीय नेतृत्व पूरी तरह चुप्पी साधे बैठा रहा।
पुरानी समस्या है बड़बोलापन
अति उत्साह और बड़बोलापन बहुत पहले से भाजपा की समस्या रही है। अति उत्साह के चलते विधानसभा की 12 सीटों के उपचुनाव और उसके बाद छावनी परिषद के चुनाव में भी भाजपा हार गई।
प्रदेश के कुछ नेताओं के अलावा कोई भी इन चुनावों में दिलचस्पी लेते नहीं दिखा। यह जानते हुए भी कि पराजय से सिर्फ कुछ नेताओं की नहीं बल्कि पूरी पार्टी की भद्द पिटेगी।
केंद्रीय नेताओं ने इन चुनावों में रुचि नहीं दिखाई। जमीनी सच्चाई पर ध्यान दिए बगैर छावनी परिषद का चुनाव पार्टी के चिह्न पर लड़ने का फैसला कर लिया।