संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना ही नहीं भूमिहीन परिवारों के लिए शुरू की गई ‘आम आदमी बीमा योजना’ का फायदा भी लोगों तक पहुंच नहीं पा रहा। राजस्व विभाग के आंकड़े बताते हैं कि इस योजना में सूबे में 56 लाख से ज्यादा लोग बीमित हैं।
पिछले छह सालों में बीमा कंपनी को 119.87 करोड़ का प्रीमियम अदा किया गया। पर, इससे फायदे की बात करें तो इन सालों में सिर्फ 13 हजार परिवारों तक 46.38 करोड़ रुपये ही पहुंचे।
यानी केंद्र व राज्य सरकार इसके प्रीमियम पर जितना खर्च कर रही है उसका आधा भी आम आदमी के पास नहीं लौटता। यही है कि लंबा चौड़ा प्रीमियम अदा किए जाने के बावजूद बीमा कंपनियों को मनमानी की पूरी खुली छूट मिली हुई है।
ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिहीन परिवारों की सामाजिक सुरक्षा के लिए यह योजना केंद्र सरकार ने शुरू की। प्रदेश में इसे 1 नवंबर 2008 से लागू किया गया।
इसके तहत 18 से 59 वर्ष तक की उम्र वाले परिवार के मुखिया बीमा के पात्र होते हैं। यदि किसी परिवार के मुखिया की उम्र 59 साल से अधिक है तो वहां उस परिवार के मुख्य कमाऊ सदस्य को बीमा सुरक्षा दिए जाने की व्यवस्था है।
केंद्र व राज्य सरकार चुकाती हैं प्रीमियम
हर परिवार के मुखिया के बीमे पर 200 रुपये प्रीमियम बीमा कंपनी को अदा किया जाता है। आधा प्रीमियम राज्य सरकार व आधा केंद्र सरकार के सामाजिक सुरक्षा कोष से चुकाया जाता है।
शर्तें तो बताती हैं कि बीमित मुखिया के परिवार को बीमे का लाभ सामान्य मृत्यु से दुर्घटना से होने वाली मृत्यु तक में मिलता है। अपंग होने पर भी बीमा का लाभ देने का प्रावधान है। योजना का लाभ पाने वाले परिवार के अधिकतम दो बच्चों को कक्षा नौ से 12 तक की पढ़ाई के दौरान 100 रुपये प्रतिमाह की दर से छमाही छात्रवृत्ति देने का भी प्रावधान है।
ये आंकड़े बताते हैं हकीकत
- प्रदेश में बीमित मुखिया सदस्यों की संख्या--55,86,077
- निस्तारित किए गए दावों की संख्या--12,933
- भुगतान की गई धनराशि--42,30,30,000 रुपये
- छात्रवृत्ति प्राप्त कर चुके बच्चों की संख्या--67814
- छात्रवृत्ति में बांटी गई रकम--4,06,88,400 रुपये
इस तरह पा सकते हैं मदद
प्राकृतिक मृत्यु--30,000
दुर्घटनावश मृत्यु--75,000
पूरी तरह अपंग--75,000
आंशिक अपंग--37,500
बीमा कंपनी को भुगतान प्रीमियम
वित्तीय वर्ष--(प्रीमियम) रुपये में
2009-10--18,69,17,600
2010-11--05,51,25,551
2011-12--39,99,99,937
2012-13--09,89,92,000
2013-14--30,55,79,773
2014-15--15,21,03,993 (फरवरी 2015 तक)
योग--1,19,87,18,854
स्रोत- (कार्यपूर्ति दिग्दर्शक: 2015-16: राजस्व विभाग)
खेल करती हैं बीमा कंपनियां
बीमा कंपनियां प्रीमियम तो लेती हैं लेकिन साथ ही खेल भी करती हैं। बीमा करने के बावजूद संबंधित के पास बॉन्ड न पहुंचने की शिकायत आम है। क्लेम के लिए दौड़ाने की शिकायतें भी होती हैं। प्रॉपर मॉनिटरिंग न होने की वजह से उन्हें इसकी खुली छूट मिल जाती है।
यह कहते हैं विशेषज्ञ
सरकार अपने स्तर से कराए क्लेम का निस्तारण
मामले पर कार्यक्रम अधिकारी एक्शन एड राजन सिंह का कहना है कि बीमित लोगों तक बीमे का बॉन्ड पहुंचना जरूरी होता है। पर तमाम लोगों तक ये बॉन्ड ही नहीं पहुंचते। दूसरी, समस्या क्लेम के निस्तारण की है। क्लेम निस्तारण की समय सीमा तय है लेकिन प्रभावित परिवार महीनों तक कंपनी का चक्कर लगाने को मजबूर होते हैं। तमाम तरह के अड़ंगे लगाए जाते हैं।
सरकारी स्तर पर क्लेम निस्तारण कराने की कारगर व्यवस्था न होने से भी योजना का ठीक से लोग लाभ नहीं पाते। यह योजना ऐसे लोगों के लिए जो गांव के भूमिहीन हैं और ज्यादा पढ़े-लिखे भी नहीं होते। पर जिस तरह बीमा कंपनियों का रुख दिखता है उससे तो यही लगता है कि वे बीमाधारकों को लाभ नहीं देने की मंशा रखती हैं।
सरकार को चाहिए कि वह क्लेम निस्तारण का काम अपने स्तर से कराए। ऐसा सिस्टम डवलेप करे जिससे बीमाधारक को आपत्तियों के बारे में समय से जानकारी मिल सके।’’
शिकायतें जानकारी में हैं, समाधान की कोशिश कर रहे हैं
वहीं, प्रमुख सचिव राजस्व सुरेश चंद्रा का कहना है कि बीमाधारकों को बीमा का लाभ मिलने में आ रही मुश्किलें संज्ञान में हैं। क्लेम के निस्तारण में भी शिकायतें हैं। सरकार इस समस्या के समाधान के लिए प्रयास कर रही है।
बीमाधारक को तय समय के भीतर योजना का लाभ दिलाने के लिए नई पहल की जा रही है। राजस्व परिषद इसके लिए वेब आधारित एक सिस्टम शुरू करेगा। इसमें योजना से जुड़ी जानकारियों के साथ-साथ बीमा धारकों को बीमा का लाभ तय समय में दिलाने की व्यवस्था होगी।