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आजम का खौफः नहीं टिक पाते बड़े-बड़े अफसर

Sat, 09 Aug 2014 03:23 AM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
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मौजूदा सरकार में वरिष्ठ मंत्री आजम खां के साथ तेजतर्रार आईएएस अफसर भी काम करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। तैनाती के बाद चंद दिन के बाद ही उन्हें लंबी छुट़्टी लेने की नौबत आ जाती है।
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फिर ट्रांसफर हो जाते हैं। प्रमुख सचिव प्रवीर कुमार, सीबी पालीवाल और देवेश चतुर्वेदी ऐसे ही अफसरों में शामिल हैं।

पर, इसे मंत्री के साथ बेहतर समझ का तकाजा ही कहेंगे कि जिस कुर्सी पर डायरेक्ट आईएएस अधिकारी नहीं टिक पाए विभाग में एक प्रमोटी आईएएस रिटायर होने के बाद पुनर्नियुक्ति पाने में सफल रहे हैं। यही नहीं वह एक साथ दो-दो विभागों के सचिव की जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

इसलिए हटना पड़ता है चुनाव से

सूबे में सरकार जिस भी पार्टी की रही हो, चुनाव आयोग हर विधानसभा व लोकसभा चुनाव से पहले थोक के भाव से आईएएस व आईपीएस अफसरों को अहम जिम्मेदारी से हटाता रहा है। इससे प्रदेश की नौकरशाही की छवि का अंदाजा लगाया जा सकता है।

पिछले लोकसभा चुनाव में करीब दो दर्जन आईएएस व डेढ़ दर्जन आईपीएस अफसरों को आयोग ने हटाया था। इसके पहले 2007 के विधानसभा चुनाव में मुख्य सचिव, डीजीपी व प्रमुख सचिव गृह समेत चार दर्जन से अधिक अफसरों को हटना पड़ा था।

लेकिन सरकार से उन अफसरों के रिश्ते का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि चुनाव खत्म होने के बाद सरकार ने आयोग द्वारा हटाए गए तमाम अफसरों को फिर उन्हीं जिलों में पोस्टिंग दे दी, जहां से वे हटाए गए थे।

नेता का रिश्तेदार होने पर हटाया गया

एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल के नेता के पारिवारिक रिश्ते से जुड़े एक आईएएस अधिकारी को बहराइच के जिलाधिकारी की कुर्सी से सिर्फ इसलिए हटा दिया गया क्योंकि वहां एक विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव होने वाले हैं।

डीएम साहब चंद दिन भी वहां नहीं रह पाए थे जिससे उनके हटाने की दूसरी वजह समझ में आती। हालांकि इस अफसर को हटाने के चंद दिन के भीतर ही दूसरे छोटे जिले में ही सही फिर से कलेक्टर के पद पर पोस्टिंग दे दी गई।

रिश्ते ही बनाते हैं नौकरशाह से विधायक, सांसद व मंत्री

सूबे में नेताओं व मंत्रियों के रुतबे को देखकर अफसर के मन में भी उनके जैसा सम्मान पाने की ख्वाहिश जाग उठती है। यही वजह है कि वह सेवा में रहते-रहते इसकी भूमिका बनाने लगते हैं।

तभी तो प्रदेश में नौकरशाही के रास्ते कई अफसर सियासत में पहुंच गए। उत्तर प्रदेश में डीआईजी के पद से रिटायर हुए आईपीएस अहमद हसन समाजवादी पार्टी से जुड़कर प्रदेश के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री पद तक पहुंचे।

पूर्व मुख्य सचिव रहे पीएल पुनिया बाराबंकी से सांसद हुए और अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष हैं। सेवानिवृत्त आईपीएस आरपी सिंह बसपा में तो रॉ प्रमुख पद से रिटायर हुए संजीव कुमार त्रिपाठी भाजपा में हैं।

आधे अफसरों को पड़ेगा घर में बैठना

अगर सूबे के आईएएस, आईपीएस व आईएफएस अफसरों पर अखिल भारतीय सेवा (आचरण) की संशोधित नियमावली को सख्ती से लागू हों तो यहां के आधे अफसरों को घर पर ही बैठना पडे़गा।

वजह है, यहां अफसर मलाईदार पोस्टिंग व भविष्य की सियासी पारी सजाने के चक्कर में नैतिकता से किनारे करते रहे हैं और किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं।

भ्रष्टाचार के आरोपों में जिस तेजी से अफसर घिरे हैं, उससे उनके नैतिक गिरावट को आसानी से समझ सकते हैं। सूबे में राजनीतिक निष्पक्षता की जगह सियासी पक्षधर बनने को तरजीह देने के कई दिचलस्प वाकये हैं।

मुलायम सिंह के लिए पढ़ा शेर

वर्ष 2006 में मुख्य सचिव के रूप में एनसी वाजपेयी का सपा की ओर से आयोजित कार्यक्रम में शामिल होना लोगों को याद ही होगा।

तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की शान में एक शेर पेश करना न सिर्फ सियासत का विषय बना बल्कि चुनाव आयोग ने ही उनकी निष्पक्षता पर संदेह जताते हुए 2007 के चुनाव में उन्हें मुख्य सचिव की कुर्सी से हटा दिया। पर, वाजपेयी को इसका फायदा भी मिला।

वर्ष 2012 में जब सपा सरकार की वापसी हुई तो वाजेपयी को राज्य योजना आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में कैबिनेट मंत्री का दर्जा हासिल हुई।

अफसर से बन गए बसपा प्रवक्ता

बसपा शासनकाल में प्रमुख सचिव गृह रहे कुंवर फतेह बहादुर तो बसपा प्रवक्ता की तरह पेश आने में भी नहीं हिचके थे। बहादुर ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस कर मुजफ्फरनगर के बसपा विधायक शहनवाज राणा को पार्टी से निलंबित किए जाने का ऐलान किया था।

उन्होंने यहां तक कहा था कि बसपा सुप्रीमो मायावती के निर्देशों के अनुसार अब पार्टी संगठन के किसी भी कार्यक्रम में राणा को नहीं बुलाया जाएगा।

नौकरशाही के आचरण में किस हद तक गिरावट आई है, इसका उदाहरण एनआरएचएम व लैकफेड घोटालों से लिया जा सकता है। इन घोटालों में जहां नौकरशाह भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाकर नजीर पेश कर सकते थे, वहां वह नेताओं के इशारे पर काम करते नजर आए।
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इनके नाम आए एनआरएचएम घोटाले में

पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा व रंगनाथ मिश्र जैसे नेता और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी प्रदीप शुक्ल, रामबोध मौर्य व सच्चिदानंद दुबे जैसे अफसर जिस तरह भ्रष्टाचार के आरोपों में फंसे, नौकरशाही-नेता गठजोड़ बेपरदा ही हुआ है।

आईएएस एसोसिएशन के अध्यक्ष केके सिन्हा का कहना है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसरों के उत्कृष्ट आचरण व गोपनीयता को लेकर पहले से सख्त प्रावधान रहे हैं।

पर जो पता चला है उसके हिसाब से मोटे तौर पर सेवा शर्तों को और सख्त किया गया है। अभी तक सर्कुलर प्राप्त नहीं हुआ है। जैसे ही सर्कुलर प्राप्त होगा, एसोसिएशन उसका अध्ययन करेगी।
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