फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

यूपी में भी बन सकता है भाजपा विरोधी मोर्चा

Tue, 26 Aug 2014 02:00 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
विज्ञापन
विज्ञापन
बिहार विधानसभा के उपचुनावों में लालू, नीतीश और कांग्रेस गठबंधन का पलड़ा भारी रहने से सबक लेते हुए यूपी में भी भाजपा विरोधी मोर्चा बन सकता है।
विज्ञापन


सपा, कांग्रेस, रालोद और छोटे दलों को एकजुट करने की कसरत चल रही है। यह कोशिश परवान चढ़ती है या नहीं, यह तो भविष्य बताएगा लेकिन मायावती को मनाना जरूर टेढ़ी खीर है।

बिहार की दस विधानसभा सीटों पर उपचुनाव में राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यू) और कांग्रेस के गठबंधन ने छह सीटों पर जीत हासिल की है।

लोकसभा चुनाव में सहयोगी दलों के साथ मिलकर 40 में 31 सीट जीतने वाली भाजपा केवल चार सीटों तक सीमित रही।

बदलेगी यूपी की भी राजनीति

माना जा रहा है कि बिहार के नतीजों से यूपी की राजनीति भी प्रभावित होगी। भाजपा विरोधी दलों को यहां भी एक प्लेटफार्म पर लाने की कोशिशें चल रही हैं।

जद (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव ने रविवार को ही लखनऊ में कहा था यूपी में भी बिहार की तरह धर्मनिरपेक्ष ताकतें एक मंच पर आएंगी।

दावा किया था कि इसकी कोशिशें चल रही है और जल्द ही इसका खुलासा होगा। बिहार में नीतीश से हाथ मिलाने वाले लालू प्रसाद यादव तो मुलायम और मायावती को दोस्ती की सलाह भी दे चुके हैं।

माया-मुलायम का साथ मुश्किल

21 साल पहले मिलकर चुनाव लड़ने के बाद सरकार बना चुके सपा-बसपा का फिर से एक साथ आना काफी मुश्किल लगता है।

गेस्ट हाउस कांड और उसके बाद के राजनीतिक हालात ने दोनों दलों के बीच की दूरियां बहुत बढ़ा दी है। लालू प्रसाद यादव के प्रस्ताव मुलायम सिंह ने मायावती से दोस्ती की हामी भर दी थी।

लेकिन, मायावती ने इससे इन्कार कर दिया। उन्होंने कहा कि उनकेलिए सत्ता से पहले सम्मान है।

अजित, मुलायम, कांग्रेस का एका संभव

ऐसी अटकलें हैं कि यूपी में भाजपा विरोधी दलों की एकजुटता के लिए मुलायम सिंह यादव, रालोद अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह और कांग्रेस से हाथ मिला सकते हैं।

सीमित प्रभाव वाले वामपंथी दलों और अन्य छोटी पार्टियों को भी साथ लिया जा सकता है। इनके साथ आने से सेकुलर वोटों का बंटवारा रुकेगा।

चर्चा तो यह भी है कि तीनों दलों के बीच सहमति बनवाने की भूमिका अमर सिंह भी तैयार कर रहे हैं।

लोकसभा चुनाव की बढ़त सिमटी

लोकसभा बिहार में जिन दस विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए हैं, उनमें वर्ष 2010 में छह सीटें भाजपा ने जीती थीं।

लोकसभा चुनाव में भाजपा आठ सीटों पर आगे रही थी। इस बार स्थिति पलट गई। राजद, कांग्रेस और जद (यू) को छह सीटें मिलीं।

यानी पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनाव की तुलना में भाजपा ने अपना जनाधार खोया है। यूपी में विपक्षी दल एकजुट होते तो यहां भी भाजपा को नुकसान हो सकता है।

वोट प्रतिशत का खेल

चुनावों में वोट मामूली वोट प्रतिशत के उतार-चढ़ाव से चुनावी नतीजे प्रभावित हो जाते हैं। बिहार में पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगी दलों को कुल मिलाकर लगभग 39 प्रतिशत वोट और 40 में 31 सीटें मिली थी।

इसमें सर्वाधिक 29.4 फीसदी वोट भाजपा के थे। तब राजद-कांग्रेस और जदयू  अलग-अलग चुनाव लड़े थे।

तीनों दलों को क्रमश: 20.1 फीसदी, 8.4 और 15.8 फीसदी वोट मिले थे। तीनों दलों के वोट मिलाकर 44 प्रतिशत से ज्यादा बैठते हैं।
विज्ञापन

तीनों की एकता का होगा फायदा

तीनों की एकता से उनका वोट बैंक भाजपा से ज्यादा हो गया और उन्हें दस में छह सीटें जीत लीं।

यूपी में पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को 42.3 फीसदी, सपा को 22.2, बसपा को 19.06, कांग्रेस को 7.50, रालोद को करीब एक प्रतिशत और आम आदमी को एक प्रतिशत वोट मिला था।

यदि विपक्षी दल एकजुट हो जाएं तो भाजपा के सामने कड़ी चुनौती पेश हो सकती है। उनमें बिखराव रहा तो भाजपा को लाभ मिलेगा।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें