योगी आदित्यनाथ के कानों तक शायद अयोध्या के तमाम संतों की यह बात पहुंच चुकी थी कि मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद वह सिर्फ कुछ ही स्थानों तक आते हैं और गिने-चुने लोगों से ही उनकी बात होती है। बाकी से वह मुलाकात नहीं करते। कलियुग में त्रेता युग की दिवाली के सफल आयोजन के बाद उनके पास अयोध्यावासियों की शायद यह कसक भी पहुंच चुकी थी कि इतना सब होने के बावजूद योगी वहां तो गए ही नहीं जहां रामलला जन्मे थे।
शायद इसीलिए उन्होंने बड़ी दिवाली के दिन सुबह ही प्रतीकों के सहारे इस कसक को दूर करने की तैयारी कर ली। प्रात: काल उन्होंने अपने साथ मौजूद अमले को हनुमान गढ़ी चलने को कहा। जहां उन्होंने संतों की इस शिकायत को भी दूर करने का उपक्रम किया कि कुछ संतों की उनसे मुलाकात नहीं हो पाती है। उन्होंने हनुमान गढ़ी के प्रवेश द्वार के पास महंत संतरामदास और फिर महंत रमेश दास से मुलाकात की।
फिर दर्शन-पूजन करके उन्होंने राम जन्मभूमि स्थल का रुख किया। राम जन्मभूमि स्थल से निकलकर वह पास में ही स्थित रंगमहल पहुंचे। जहां से निकलकर वह श्रीराम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास के स्थल मणिराम दास छावनी गए। यहां के बाद उन्होंने सुग्रीव किला पहुंचकर स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य से मुलाकात की। पुरुषोत्तमाचार्य इस वक्त बीमार हैं। फिर वह बड़ा भक्तमाल गए। इसके बाद अयोध्या आंदोलन का केंद्र रहे दिगंबर अखाड़े पहुंचकर संतों से मुलाकात की।