भदोही कॉर्पेट एक्सपो मार्ट के प्रबंधन एवं संचालन के लिए एजेंसी का चयन खुली निविदा से होगा। कैबिनेट की मंगलवार को हुई बैठक में इस प्रस्ताव पर मुहर लगा दी गई। एक बार में 10 वर्ष के लिए एजेंसी का चयन किया जाएगा। 60 फीसदी दुकानों का आवंटन कार्पेट मैन्युफैक्चरर्स और एक्सपोर्टर्स को किया जाएगा।
राज्य सरकार के प्रवक्ता सिद्धार्थनाथ सिंह ने बताया कि मैनेजमेंट ऑपरेशनल मॉडल के तहत कंपनी, फर्म, एसपीवी, ज्वाइंट वेंचर या सोसाइटी का चयन किया जाएगा। 10 वर्ष के बाद कार्पेट एक्सो मार्ट के प्रबंधन एवं संचालन के लिए दोबारा निविदा आमंत्रित की जाएगी। दोबारा निविदा में आई उच्चतम बोली को मैच करने का अधिकार प्रथम 10 वर्ष के संचालक को होगा। उस दर पर सहमत होने पर उसे पुर्नआवंटन में वरीयता दी जाएगी। आरएफक्यू (रिक्वेस्ट फॉर कोटेशन) और आरएफपी (रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल) प्रक्रिया के दौरान दो अनिवार्य प्री-बिड कॉन्फ्रेंस लखनऊ और भदोही में होगी। मार्ट में निर्मित स्थायी दुकानों का आवंटन सभी जिलों के कार्पेट निर्माण से संबंधित मैन्युफैक्चरर्स व एक्सपोर्टर्स को किया जा सकता है।
स्थानीय मैन्युफैक्चरर्स और एक्सपोर्टर्स को वरीयता दी जाएगी। दुकानों के आवंटन मद में या अन्य किसी भी प्रकार की जमा राशि एस्क्रो अकाउंट में जमा होगी। इसका संचालन गवर्निंग कमेटी और मैनेजिंग एंड ऑपरेटिंग एजेंसी संयुक्त रूप से करेंगी। ब्याज की राशि मैनेजिंग एंड ऑपरेटिंग एजेंसी के खाते में हर तिमाही जमा होगी। दुकान आवंटन मद में या अन्य किसी प्रकार की जमानत राशि की वापसी के लिए गवर्निंग कमेटी को दो माह पूर्व सूचना देनी होगी। इसके लिए सभी आवेदन मैनेजिंग एंड ऑपरेटिंग एजेंसी को दिए जाएंगे। गवर्निंग कमेटी की अध्यक्ष की स्वीकृति के बाद राशि वापस होगी।
अब उच्च शिक्षण संस्थानों में कुल 15 वर्षों का अध्यापन, शोध या प्रशासन का अनुभव हासिल करने वाले भी अशासकीय स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों में प्राचार्य बन सकेंगे। कैबिनेट की बैठक के बाद सरकार के प्रवक्ता सिद्धार्थनाथ सिंह ने बताया कि वर्ष 2005 में प्राचार्य पद के लिए जो मानदंड निर्धारित किए गए थे, उसके अनुसार उच्च शिक्षा से जुड़े विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और अन्य संस्थानों में 15 वर्ष तक सह आचार्य (उपाचार्य) या आचार्य रहने वाले ही प्राचार्य पद के लिए आवेदन कर सकते थे।
गैर अनुदानित और स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों की संख्या ज्यादा होने के कारण इस मापदंड के अनुरूप प्राचार्य नहीं मिल पा रहे थे। प्राचार्य की तैनाती न होने के कारण राज्य विश्वविद्यालय इन महाविद्यालयों की संबद्धता को बनाए रखने पर आपत्ति लगा रहे थे। इसलिए गैर अनुदानित और स्ववित्त पोषित अशासकीय महाविद्यालय के प्राचार्य की अर्हता शर्तों में बदलाव किया गया है।
प्रदेश सरकार ने ऐसा उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-1973 की धारा 50 की उपधारा 6 के तहत मिली शक्तियों का प्रयोग करते हुए किया है। स्नातकोत्तर में न्यूनतम 55 फीसदी अंक और पीएचडी की अर्हता पहले की तरह ही बरकरार रहेगी।