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कैसे पूरे होंगे वादे, अब तक अपनी टीम ही नहीं चुन पाएं सीएम आदित्यनाथ

Wed, 29 Mar 2017 11:51 AM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
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मुख्यमंत्री आदित्यनाथ - फोटो : amar ujala
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का राजकाज संभाले दस दिन हो गए हैं लेकिन वह न तो अभी अपने कार्यालय की टीम बना पाए हैं और न अफसरशाही में निहायत जरूरी बदलाव पर आगे बढ़े हैं।
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कई मंत्री पिछली सरकार के अफसरों के साथ काम करने में हिचकिचा रहे हैं लेकिन तबादला-पोस्टिंग के लिए सीएम पर दबाव न बनाने की पीएम की नसीहत की वजह से मुंह नहीं खोल पा रहे हैं। बदलाव का संदेश देने में जुटे योगी के लिए प्रशासनिक अमले में फेरबदल में देरी से कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

परंपरा रही है कि नई सरकार के गठन से पहले पुराने मुख्यमंत्री अपने सचिवालय की टीम को हटा देते हैं ताकि नए मुख्यमंत्री को अपनी टीम चुनने में किसी तरह की दुविधा न रहे। योगी ने 19 मार्च को शपथ लेने के बाद अभी तक अपने सचिवालय की टीम का गठन नहीं किया है।
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मुख्यमंत्री कार्यालय में प्रमुख सचिव व सचिव सहित करीब आधा दर्जन आईएएस अधिकारियों की जरूरत होती है। प्रदेश व केंद्र में एक ही दल की सरकार होने की वजह से राज्य से केंद्र की प्रतिनियुक्ति तक में तैनात अफसरों में से पसंद का अफसर चुनने में कोई दिक्कत नहीं मानी जाती। बताया जाता है कि योगी केंद्र से अपनी पसंद के अफसर मांग भी चुके हैं। पर, बात बन नहीं पा रही।

नई सरकार के रवैये से हो रहे हैं असहज

चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा नेताओं ने चुनिंदा महकमों के मंत्रियों और वहां तैनात कुछ खास अफसरों पर निशाना साधा था। मगर, ऐसे अफसर नई सरकार को साधने में सक्रिय नजर आ रहे हैं। नई सरकार का ऐसे अफसरों के प्रति ठंडा रवैया भी लोगों को असहज कर रहा है।

इसके अलावा कुछ अफसरों के पास कई-कई विभागों का बोझ है। चुनाव के दौरान जब काम कम करना होता है, तब कामचलाऊ व्यवस्था में कोई दिक्कत नहीं होती। लेकिन अब जब नई सरकार अपने संकल्प पत्र पर तेजी से काम की बातें कर रही है तब भी पुराने ढर्रे पर कामकाज से सियासी गलियारे में तरह-तरह की चर्चाओं को बल मिल रहा है।

मसलन, योगी मुख्यमंत्री तो बना दिए गए लेकिन अपनी टीम चुनने तक की आजादी नहीं मिली। अफसरशाही में फेरबदल में भी ‘दिल्ली’ की भूमिका रहने वाली है। यहां अफसरशाही बदलाव तय मान रही है लेकिन सरकार का रुख साफ न होने से वह तमाम निर्देशों के बावजूद मन से काम नहीं कर पा रही है।

31 मार्च के बाद तबादले संभव

नई सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री ने बताया कि अफसरों के तबादलों को लेकर मंथन चल रहा है। लेकिन वित्तीय वर्ष के आखिरी दिनों में सरकार तबादले से बच रही है ताकि वित्तीय स्वीकृतियां जारी करने में परेशानी न आए।

लंबे समय से विभागों का काम देख रहे अधिकारी वित्तीय स्वीकृतियां जारी करेंगे तो ज्यादा बेहतर होगा।

नए अधिकारियों के विभाग में आने पर जल्दबाजी में स्वीकृतियां जारी करने से गलती की संभावना हो सकती है। ऐसे में 31 मार्च के बाद योगी सरकार अफसरशाही में जरूरी फेरबदल शुरू कर देगी।

ये हैं प्रमुख अफसर जिन पर है कई महकमों का भार

- 1984 बैच के आईएएस संजय अग्रवाल ऊर्जा विभाग व पावर कॉर्पोरेशन के सर्वेसर्वा होने के साथ-साथ ग्रेटर नोएडा व यमुना एक्सप्रेस- वे के चेयरमैन भी हैं। इन दोनों जिम्मेदारियों में कोई संबंध नहीं है। पर, पिछली सरकार में जब वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रमारमण को हटाकर किसी दूसरे अफसर को नोएडा की जिम्मेदारी देने की नौबत आई तब ऊर्जा व औद्योगिक विकास सहित एक साथ तमाम काम देख रहे अग्रवाल ही बेहतर पसंद बने।

- 1987 बैच के आईएएस रमारमण को कोर्ट की सख्ती के बाद नोएडा के विभिन्न प्राधिकरणों से हटाना पड़ा तो तत्कालीन सरकार ने उन्हें अथॉरिटी से जुड़े सारे फैसलों पर अंतिम मुहर लगाने की जिम्मेदारी वाले महकमे औद्योगिक विकास का प्रमुख सचिव बना दिया। गौर करने वाली बात यह कि उन्हें नोएडा अथॉरिटी का चेयरमैन भी बनाए रखा गया।

- 1983 बैच के आईएएस सदाकांत के पास प्रमुख सचिव आवास जैसे अहम महकमे की जिम्मेदारी है। शहरों में मेट्रो जैसा बड़ा प्रोजेक्ट इसी महकमे के निर्देशन में आगे बढ़ रहा है। पर, पिछली सरकार को जब लोक निर्माण का अतिरिक्त कार्य देने का मौका आया तो भरोसा सदाकांत पर ही जाकर टिका।

ये अफसर भी देख रहे हैं कई विभागों की जिम्मेदारी

- 1983 बैच के आईएएस संजीव सरन के पास वन एवं पर्यावरण के अलावा आईटी एवं इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग की भी जिम्मेदारी है। सरन जिस भी विभाग में रहे, खासी चर्चा में रहे। सामूहिक मुहिम से पेड़ लगवाने का रिकॉर्ड छोड़ दें तो वह किसी भी महकमे में उल्लेखनीय परफार्मेंस नहीं दे पाए।

-  1985 बैच के आईएएस आरके तिवारी के पास श्रम के अलावा वाणिज्य कर महकमे की जिम्मेदारी है।

- 1991 बैच के आईएएस कामरान रिजवी एक साथ तीन-तीन काम देख रहे हैं। ग्राम्य विकास आयुक्त, महानिदेशक राज्य पोषण मिशन के अलावा उनके पास प्रमुख सचिव नियुक्ति एवं कार्मिक की भी जिम्मेदारी है।

- 1995 बैच के आईएएस डॉ. आशीष कुमार गोयल के पास सचिव ग्राम्य विकास के अलावा मंडी निदेशक का भी प्रभार है। मंडी निदेशक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है और किसानों से जुड़े कामों के लिए यहां पूर्णकालिक अफसर की जरूरत होती है।
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चार महीने से अटकी है पदोन्नति वाले पद पर तैनाती

2001 बैच के आईएएस अजय कुमार शुक्ला झांसी के डीएम हैं। दिसंबर में उनकी सुपर टाइम स्केल व सचिव वेतनमान में पदोन्नति हुई थी। इसके बाद उन्हें सचिव या कमिश्नर स्तर की तैनाती मिलनी चाहिए।

मगर, चुनाव आयोग ने वरिष्ठ अधिकारी के नाते अजय को विधानसभा चुनाव के दौरान नहीं हटाया और उन्हीं से चुनाव करवाने का फैसला किया। नई सरकार आने के बाद भी पदोन्नति के हिसाब से उनकी तैनाती फंसी हुई है। कई दूसरे अधिकारी उनके हटने का इंतजार कर रहे हैं ताकि उन्हें भी कलेक्टरी करने का अवसर मिल सके।

वेटिंग में पड़े अफसरों के भविष्य का फैसला भी अटका
पिछली सरकार ने कई अफसरों को हटाकर वेटिंग में डाल दिया था। इनमें से कई को हटाने की कोई वजह सामने नहीं आई। ये सभी घर बैठे हुए हैं। 1998 बैच के आईएएस अनिल कुमार सागर सपा सरकार आने के बाद से ही कम महत्व वाले विभागों में तैनात किए जाते रहे। लंबे समय तक वह निशक्तजन कल्याण विभाग में तैनात रहे।

पिछले साल जून में उन्हें हटाकर वेटिंग में डाल दिया। तबसे वेटिंग में ही हैं। इसी तरह 2007 बैच के अभय, 2002 बैच के राजीव रौतेला, 2005 बैच की अनीता श्रीवास्तव, 2008 बैच के चंद्र भूषण सिंह, 2009 बैच के भानुचंद्र गोस्वामी व 2002 बैच के भवनाथ भी वेटिंग में डाल दिए गए। इन सबके बारे में फैसला भी नई सरकार को ही करना है।
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