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साख पर संकट: मिट्टी में मौजूद घातक रसायन बना रहे मसालों को हानिकारक, खत्म हो रही धरती की नमी

Thu, 16 May 2024 01:29 PM IST
ishwar ashish अभिषेक गुप्ता, अमर उजाला, लखनऊ

सार

मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा .5 प्रतिशत होनी चाहिए लेकिन वर्तमान में यह .2 प्रतिशत हो गई है। 
कीटनाशकों के ज्यादा इस्तेमाल से धरती की नमी खत्म हो रही है।
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- फोटो : amar ujala
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विस्तार
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रासायनिक खाद और कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से पैदावार तो जरूर बढ़ी है, लेकिन दूसरी तरफ मिट्टी की सेहत खराब होने लगी है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार फसल के अच्छे उत्पादन के लिए मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा .5 प्रतिशत या इससे अधिक होनी चाहिए, लेकिन वर्तमान में यह मात्रा .2 प्रतिशत पर आ गिरी है। ये मिट्टी की सेहत के लिए अच्छा संकेत नहीं है। मसाला उद्योग से जुड़े कारोबारियों का सवाल है कि उसी मिट्टी से रसोई मसालों में पहुंचने वाले कीटनाशकों से कैसे बचा जाए।

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कभी फसलों के लिए वरदान समझे जाने वाले ये कीटनाशक आज बेतहाशा बढ़ते उपयोग के चलते अभिशाप बन गए हैं। ये पर्यावरण के साथ-साथ, पानी, मिट्टी, हवा और खाद्य पदार्थों को भी जहरीला बना रहे हैं। इनका अंधाधुंध तरीके से खेतों में होता उपयोग, किसानों के लिए भी खतरा है, क्योंकि यह मिट्टी की गुणवत्ता को खराब कर रहा है।

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खड़े मसालों की खेती में 55 से ज्यादा कीटनाशकों का प्रयोग
रसोई मसालों में घातक कीटनाशक पाए जाने के बाद साख पर मंडराते संकट से जूझ रहे पैकेटबंद ब्रांडेड मसाला उद्योग के उद्यमियों का कहना है कि खड़े मसालों की खेती में ही 55 से ज्यादा कीटनाशकों का इस्तेमाल हो रहा है। मानकों से ज्यादा कीटनाशक मिट्टी में ही घुल गए हैं, जिनका असर खड़े मसालों में आ गया है। कच्चे माल की प्रकृति में ही शामिल कीटनाशकों को कैसे हटाया जाए, इसकी प्रोसेसिंग का रास्ता और तकनीक बताई जाए। पेस्टीसाइड्स एटलस रिपोर्ट के मुताबिक कीटनाशकों के कारण खेतों में रहने वाली चिड़ियों और तितलियों की आबादी में करीब 30 फीसदी की गिरावट आई है।

पांच सबसे बड़ी कीटनाशक कंपनियों का फोकस भारत
संगठन अनअर्थड और पब्लिक आई की संयुक्त जांच के मुताबिक पता चला है कि दुनिया की पांच सबसे बड़ी कीटनाशक कंपनियों की करीब एक तिहाई कमाई हानिकारक कीटनाशकों की बिक्री से आता है। इन एग्रोकेमिकल दिग्गजों में बीएएसएफ, बेयर, कोर्टेवा, एफएमसी और सिन्जेंटा शामिल हैं। यहां के किसान कीटनाशकों पर प्रति हेक्टेयर 45 फीसदी अधिक खर्च कर रहे हैं। विश्लेषण के अनुसार भारत में इन कंपनियों द्वारा बेचे गए कुल कीटनाशकों में अत्यधिक हानिकारक कीटनाशकों का हिस्सा करीब 59 फीसदी था।

16 हजार करोड़ से ज्यादा के कीटनाशक हर साल बिक रहे
वर्ष 2013 के बाद से खेती में कीटनाशकों के इस्तेमाल में लगातार बढ़ोतरी हुई है। 1953-54 में देश में 154 मीट्रिक टन कीटनाशकों का इस्तेमाल होता था। जो 2016 में 57,000 मीट्रिक टन हो गया। अब तो ये एक लाख मीट्रिक टन से ज्यादा हो गया है। किसान हर साल 16 हजार करोड़ से ज्यादा इसी पर खर्च कर रहे हैं। पांच साल बाद 2019 तक ये खपत 25 हजार करोड़ से ज्यादा होने का अनुमान है। इस वजह से खेती की जमीन को भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।

यूपी सहित कई राज्यों में जमीन धंसने का खतरा
पहले महाराष्ट्र में कीटनाशकों की खपत सबसे ज्यादा थी। इसके बाद उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा थे। फिलहाल केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड और पंजीकरण समिति (सीआईबीआरसी) के साथ 970 जैव कीटनाशक उत्पाद पंजीकृत हैं। कीटनाशकों के जमीन में रिसाव से सबसे ज्यादा नुकसान धरती को हो रहा है। कीटनाशक के ज्यादा इस्तेमाल से धरती की नमी खत्म हो रही है और धरती धंस रही है। भारत में धरती के धंसने का सबसे ज्यादा खतरा दस राज्यों में है। इनमें महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, पंजाब, तेलंगाना, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, राजस्थान और गुजरात शामिल हैं।
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मिट्टी की सेहत खराब कर रहे कीटनाशक
- भारत में 92 कीटनाशक, 40 कवकनाशक और 7 वृद्धिवर्धक का प्रयोग होता है।
- भारत में 381 ग्राम प्रति हेक्टेयर कीटनाशकों का प्रयोग।
- सब्जियों में 14 प्रतिशत कीटनाशक का प्रयोग। सबसे ज्यादा मिर्च और बैंगन में।
- कीड़ों के कारण हर साल 30 फीसदी तक सब्जी खराब होती है। 50 हजार करोड़ का नुकसान।
- अकेले मिर्च में 54 तरह के कीटनाशकों का इस्तेमाल होता है।
(स्रोत - भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद)

अत्यंत खतरनाक कीटनाशक जो धुआंधार हो रहे इस्तेमाल
भोपाल गैस रिसाव कांड तो याद ही होगा। यूनियन कार्बाइड लिमिटेड के कारखाने में ‘कार्बारिल’ नामक कीटनाशक के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाला केमिकल तैयार होता था। कार्बारिल बाजार में ‘सेविन’ के नाम से बिकता है। कृषि और गैरकृषि (मैदानों, घरेलू बगीचों व सड़क के किनारे की हरियाली) संबंधी उपयोग में मकड़ी, पिस्सू, किलनी आदि को मारने में काम आता है। ये कैंसर का कारक भी है। अन्य जहरीले कीटनाशक फोरेट, फास्फोमीडान, कार्बोफ्यूरान, डाइक्लोरवास, मेथोमिल, ऑक्सीडेमेटान मिथाइल, ट्राइएजोफास, कार्बारिल और कार्बोसल्फान का भी धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है।

चैम्बर आफ फूड प्रोसेंसिंग इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के मुख्य सलाहकार मनीष अग्रवाल का कहना है कि फसल में ही पेस्टीसाइड का जमकर इस्तेमाल रहा है। मानक से बीस गुना ज्यादा कीटनाशकों का छिड़काव किया जा रहा है। कीटनाशक की खपत में कई गुना वृद्धि हुई है। यूरिया और डीएपी का जीन भी मिट्टी में घुल गया है। खड़े मसालों में ही कीटनाशक शामिल गए हैं। इसे दूर करने का रास्ता विभाग बताए। अपने स्तर से भी इस समस्या का रास्ता इंडस्ट्री खोज रही है।

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