अगले चुनाव में कई उलटफेर होने हैं। बाबूजी की जगह मोदी का नाम चला तो, 'उन्होंने' पहले बढ़-चढ़कर दावा कर दिया था कि अगला चुनाव वे ही लड़ेंगे, पार्टी के पास उनका कोई विकल्प ही नहीं है।
अब मोदी पार्टी का असल चेहरा बन गए, तो बाबूजी नई सियासत में जुट गए हैं। हाल में, राजधानी में हुए एक उद्घाटन समारोह में उन्होंने मुस्लिम धर्मगुरु बुलाए।
डॉक्टर, इंजीनियर, कर्मचारी संगठनों के नेता, प्रोफेसर, व्यापारी, बुद्धिजीवी और समाजसेवी भी बुलाए। बताना चाहते थे कि लखनऊ में एक वही हैं, जिनके साथ हर तबके के लोग हैं।
गलतफहमी में दावा ऐसा भी कि यहां मोदी या कोई दूसरा नहीं बल्कि हम ही चलेंगे। लेकिन, दूसरे भगवा झंडे वाले कौन से कम हैं? कारसेवा में जुट गए हैं।
चिट्ठी-पत्री के साथ नया तुक्का लाए हैं। तर्क है कि जिन्हें बतौर मेहमान बुलाया, मोदी विरोध ने उनकी क्या गति कर दी, यह बाबूजी को नहीं दिख रहा क्या?