लखनऊ का चाइना बाजार गेट कभी शाही महलों के एक इलाके का उत्तरी फाटक था। वाजिद अली शाह के जमाने में इस पूरी बस्ती अपनी पहचान हुआ करती थी।
कैसरबाग के पूरबी लाखी दरवाजे और चाइना बाजार गेट से आने वाली सड़क से जो चौपड़ बनती थी उसी पर बादशाह मंजिल, वजीर मंजिल, ऐश मंजिल, चौलक्खी कोठी जैसे मशहूर महलात थे।
यह बाग पश्विमी योरोपियन मूर्तियों से सजा हुआ था, जिसकी रबिशें, बैठकें और फव्वारे चीनी मिट्टी से सजा हुआ था। चाइना बाजार गेट के आगे से दर्शन विलास महल तक एक बेहतरीन बाजार लगा करता था।
नवाब सआदत अली खां के वक्त में इसे खास बाजार कहा जाता था और नवाब वाजिद अली शाह की हुकूमत में इसे चाइना बाजार कहा जाने लगा। एक समय में हर नफीस चीज में चीन शब्द जोड़ दिया जाता था।
शकर, उजली पाटरीज, सुंदर बेलबूट सब चीनी कहे जाते थे। मिस्र के बाजार से बाजी लगाने वाले इस बाजार में देश- विदेश की चीजें बिकने के लिए आया करती थीं।
गदर में लखनऊ की बहुत सी इमारतें ध्वस्त हो गईं लेकिन बची रहने वाली चंद इमारतों में से एक नाम इसका भी था। यहां से गुजरने वाली सड़क को हालांकि बंद करके इसमें प्रेस क्लब कायम कर दिया गया।
चाइना बाजार गेट के सामने एक दरख्त पर कुंवर जियालाल नसरतजंग को अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी। यह बेगम हजरत महल की हुकूमत में युद्ध में मंत्री थे।
चांदी वाली बारादरी, चाइना बाजार गेट से कुछ दूर भीतर दाहिनी तरफ है। इसे नवाब सआदत अली खां ने बनवाया था। वाजिद अली शाह के वक्त में इसे चांदनी कोठी भी कहा जाता था।
असल में इस पर चांदी की चादर चढ़ी हुई थी। गदर के बाद अंग्रेजों ने कैसरबाग को बेरहमी से लूट लिया।
अगर आज इस इमारत की कोई आखिरी निशानी बनी है, तो वह बारादरी के सामने छह कोने के सितारे की शक्ल का चीनी टकुडों से सजा हुआ एक हौज भर है।