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शर्मनाक: चंदा करके घर लाना पड़ा जवान का शव

Sat, 05 Dec 2015 12:18 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, कानपुर
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एयरफोर्स के दिवंगत जवान महेश चंद्र बाजपेई के घर वालों ने सपने में भी न सोचा होगा कि बेटे की आंख बंद होते ही अधिकारी मुंह फेर लेंगे। उसके ताबूत को घर लाने में साथियों के चंदे की जरूरत पड़ जाएगी।
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डेंगू से पीड़ित देश के ‘लाल’ के शव को घर लेकर पहुंचे परिजनों ने नम आंखों से अपना दुख ‘अमर उजाला’ से बयान साझा किया। कहा कि मामले की शिकायत गृह मंत्रालय से करेंगे।

घाटमपुर भीतरगांव ब्लाक के पसेमा गांव के संदीप वाजपेई ने बताया कि उनका भतीजा महेश वर्ष 2006 में वायु सेना में भर्ती हुआ था। वह दीपावली की छुट्टी पर गांव आया था तो डेंगू से पीड़ित हो गया।
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फिर भी वह 25 नवंबर को ड्यूटी पर बंगलूरू पहुंच गया। 27 नवंबर को उसकी हालत बिगड़ने पर बहू प्रीती ने वहीं एयरफोर्स अस्पताल में भर्ती कराया। हालत बिगड़ने की सूचना पर महेश के पिता महेंद्र, उसके ससुर सुनील तिवारी के अलावा संदीप भी अपनी पत्नी अंजलि के साथ वहां पहुंच गए।

बुधवार दोपहर 3 बजे महेश की मौत हो गई। बकौल संदीप इसके बाद हम लोगों ने वहां अफसरों से महेश के पार्थिव शरीर को घर ले जाने की बात कही। आरोप है कि अफसरों ने इसका इंतजाम न करने की बात कहकर हाथ खड़े कर दिए और वहीं पर अंतिम संस्कार करने का दबाव बनाने लगे।
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बोले अधिकारी, दो महीने क्वार्टर खाली करो क्वार्टर

इसका हम लोगों ने विरोध किया। चूंकि हम लोग अचानक वहां पहुंचे थे, इसलिए हमारे पास इतने रुपये नहीं थे कि हम लोग फ्लाइट से शव लेकर आ सकें। यह जानकारी यूनिट के साथियों को लगी तो उन्होंने आपस में चंदा करके हम सभी का फ्लाइट का टिकट बनवाकर दिया।

वहां प्लेन शुक्रवार सुबह 11:30 बजे रवाना हुआ और दोपहर 1:30 बजे लखनऊ एयरपोर्ट पहुंचा। फिर सड़क मार्ग से शव गांव ले जाया गया। परिजनों ने आरोप लगाया कि अधिकारियों ने चलते समय दो महीने में क्वार्टर भी खाली करने की बात कही।

महेश अपने पीछे पत्नी प्रीती और बच्ची कोमल को छोड़ गया है। उनकी शादी साल 2011 में हुई थी। पसेमा गांव निवासी जवान महेशचंद्र बाजपेई की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है।

पिता के नाम मात्र डेढ़ बीघे कृषिभूमि है। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के चलते पिता भीतरगांव में एक दुकान में नौकरी करते हैं। परिजनों ने बताया कि रात हो जाने के चलते शुक्रवार को अंत्येष्टि नहीं की जा सकी।
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