आलमबाग के 45 साल के विक्रम (बदला नाम) को किडनी इंफेक्शन था। उनकी निजी अस्पताल में डायलिसिस हो रही थी। स्थिति गंभीर हुई तो केजीएमयू पहुंचे। यहां जांच में पता चला कि वह हेपेटाइटिस-सी पॉजीटिव हो गए हैं। अब उनकी डायलिसिस पॉजीटिव वाली मशीन पर चल रही है।
केस-2
अयोध्या की 65 साल की शांति (बदला नाम) सरकारी अस्पताल में डायलिसिस करा रही थीं। माहभर पहले उन्हें केजीएमयू रेफर किया गया। यहां रिपोर्ट एचसीवी पॉजीटिव निकली। परिवारीजनों ने बताया कि वह निगेटिव थीं, लेकिन डायलिसिस के दौरान गड़बड़ी से हेपेटाइटिस की चपेट में आ गईं।
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ये केस तो उदाहरण मात्र हैं। ऐसे मामले केजीएमयू की डायलिसिस यूनिट में रोजाना आ रहे हैं। ये वे मरीज हैं जो पहले निगेटिव थे, लेकिन निजी अस्पताल व जिला अस्पताल में डायलिसिस में चूक से हेपेटाइटिस- सी वायरस (एचसीवी) पॉजीटिव हो गए। शताब्दी अस्पताल के नेफ्रोलॉजी विभाग में पॉजीटिव व निगेटिव मरीजों के लिए अलग-अलग मशीनें हैं।
17 डायलिसिस मशीनों में छह पॉजीटिव मरीजों के लिए हैं। असाध्य मरीजों की डायलिसिस मुफ्त होती है, जबकि अन्य मरीजों से 1200 रुपये शुल्क लिया जाता है। एचआईवी पॉजीटव के साथ एचसीवी पॉजीटिव मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इससे वेटिंग शुरू हो गई है।
डायलेजर की गड़बड़ी भी जिम्मेदार
सरकारी अस्पतालों में पीपीपी मॉडल पर खुली डायलिसिस यूनिट में एक ही डायलेजर को बार-बार इस्तेमाल से यह समस्या आ रही है। कई जिलों की डायलिसिस यूनिट व निजी अस्पतालों की यूनिट में पॉजीटिव मरीजों के लिए अलग से मशीनें नहीं हैं। इससे भी पॉजीटिव मरीज बढ़ रहे हैं।
केजीएमयू में जनवरी व फरवरी में 35 एचसीवी पॉजीटिव मरीज आए हैं। जिला अस्पतालों से भेजे जाने वाले मरीजों के रेफरल लेटर पर बाकायदा लिख जाता है कि है मरीज पॉजीटिव है। यहां इन मरीजों को अलग कर लिया जा रहा है।
री प्रोसेसिंग मशीन जरूरी
डायलेजर की स्क्रीनिंग को री प्रोसेसिंग मशीन लगती है। केजीएमयू, पीजीआई व लोहिया संस्थान में यह लगी है। इसमें डायलेजर लगाने से पता चल जाता है कि इसे कितने मरीजों में प्रयोग किया जाना है। यदि डायलेजर खराब हो जाता है तो उस पर बंडल वाल्यूम फेल लिख कर आ जाता है। जिन मरीजों के ब्लड में ज्यादा संक्रमण होता है उनका डायलेजर जल्दी खराब होता है। जिन स्थानों पर यह मशीन नहीं लगी है, वहां डायलेजर को सिर्फ एक बार ही प्रयोग करने का नियम है।
पॉजीटिव मरीजों में इस्तेमाल होने वाले डायलेजर व ट्यिूबिंग को तुंरत नष्ट कर दिया जाता है। पॉजीटिव वाले डायलेजर से दूसरे में संक्रमण हो सकता है। टेक्नीशियन व अन्य कर्मचारियों को भी संक्रमण का खतरा रहता है। वहीं, कई मरीजों में बार-बार खून चढ़ाना पड़ता है। इसमें लापरवाही से भी मरीज एचसीवी पॉजीटिव हो जाता है।
केजीएमयू में सभी मरीजों का एलाइजा व कार्ड टेस्ट कराया जाता है। पता चल जाता है कि मरीज पॉजीटिव है या निगेटिव। सभी जगह पॉजीटिव मरीजों के लिए अलग मशीन तय कर दी जाए तो यह समस्या खत्म हो जाएगी। -प्रो. एसएन शंखवार, सीएमएस, केजीएमयू