सुबह-शाम लें भाप, सीओपीडी से मिलेगी राहत
सीओपीडी के मरीजों में 18 गुना अधिक होता है निमोनिया का खतरा
69 फीसदी घरेलू महिलाएं इस बीमारी की चपेट में, मच्छर अगरबत्ती, चूल्हे का धुआं, सोफा, कालीन इसकी बड़ी वजह
नेशनल कालेज ऑफ चेस्ट फिजिशियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं केजीएमयू रेस्पेरेटरी मेडिसिन विभागाध्यक्ष प्रो. सूर्यकांत ने कहा कि क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) के मरीज सुबह-शाम भाप लेकर राहत पा सकते हैं। इन मरीजों में निमोनिया का खतरा करीब 18 गुना अधिक रहता है। अब इसका टीका भी लगाया जा रहा है। इलाज का पैटर्न बदला है। मरीज की जांच रिपोर्ट और उसके रहन-सहन के आधार पर दवाएं दी जाती हैं। वह रविवार को इंडियन चेस्ट सोसायटी यूपी चैप्टर की ओर से राजधानी के एक होटल में ‘बेस्ट ऑफ चेस्ट 2019’ कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे।
प्रोफेसर सूर्यकांत ने क हा कि विश्व में करीब 15 लाख लोग सीओपीडी से हर साल जान गंवाते हैं, जिसमें करीब पांच लाख लोग भारत के हैं। सीओपीडी की चपेट में करीब 69 फीसदी घरेलू महिलाएं हैं। चूल्हे पर खाना बनाने के साथ ही यदि कमरे में कोई सिगरेट पी रहा है तो उसकी भी चपेट में वे आ जाती हैं। मच्छर मारने वाली अगरबत्ती सौ सिगरेट के बराबर प्रदूषण फैलाती है। इसी तरह अगरबत्ती, सोफा, कालीन आदि की वजह से सीओपीडी के मरीज बढ़ रहे हैं। कार्यशाला में इस कार्यशाला में उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड के करीब 250 चिकित्सकों ने हिस्सा लिया। इस दौरान एम्स न्यू दिल्ली से डॉ. करन मदान, डॉ. बीपी सिंह, डॉ. वी नागरार्जुन, डॉ. नितिन, डॉ. वेद प्रकाश, डॉ. राजेंद्र प्रसाद आदि मौजूद थे।
इलाज का पैटर्न बदलने पर विचार
नए शोधों के आधार पर अब सीओपीडी के मरीजों केइलाज के तरीके बदले जा रहे हैं। अब इंडोब्रांकिल अल्ट्रासाउंड आ गई है। इसके बारे में चेस्ट फिजीशियन को भी जानकारी दी जा रही है। वह खुद इसका प्रयोग कर मर्ज का सटीक इलाज कर सकते हैं। सीओपीडी में जिन मरीजों में बलगम ज्यादा आ रहा है उन्हें एनएसी दवाएं देने, धूल, धुएं वाले क्षेत्र के निवासियों को मेडफार्मिन भी देने का फैसला लिया गया है। पहले माना जाता था कि बीटा ब्लाकर दवाएं नहीं देनी हैं, लेकिन नए शोध में इन दवाओं की जरूरत बताई गई है। इन दवाओं से सीओपीडी के मरीजों की मौत में करीब 44 फीसदी की गिरावट आई है। इससे दिल का दौरा पड़ने का खतरा करीब 28 फीसदी कम हो जाता है।
- डॉ. सूर्यकांत, अध्यक्ष एनसीसीपी
अस्थमा के सबसे ज्यादा मरीज राजस्थान और यूपी में
अस्थमा के मरीजों में उत्तर प्रदेश और राजस्थान के मरीजों की संख्या सबसे ज्यादा है। यहां प्रति एक लाख में करीब 112 मरीज अस्थमा से पीड़ित हैं। इसकी बड़ी वजह यहां का बढ़ता पर्यावरण प्रदूषण माना जा रहा है। एक तरफ प्रदूषण बढ़ रहा है तो दूसरी तरफ अस्थमा को लेकर जागरूकता का अभाव है। पूरे देश में करीब तीन करोड़ लोग अस्थमा की चपेट में हैं। इसमें नौ फीसदी लोग ही नियमित तौर पर दवाएं लेते हैं।
- डॉ. वीरेंद्र सिंह, जयपुर
टीबी मरीजों के साइड इफेक्ट पर देना होगा ध्यान
टीबी की दवाएं खाने वाले मरीजों में कई तरह के दुष्प्रभाव सामने आते हैं। इससे वे दवा से आजिज आ जाते हैं और दवा खाना छोड़ देते हैं। ऐसे में टीबी की दवाओं के साथ ही उनके साइड इफेक्ट को नियंत्रित करने वाली दवाएं भी देनी चाहिए। इस प्रयोग के बिना 2030 तक टीबी खत्म नहीं हो सकता है। टीबी के इलाज के पैटर्न बदलने पर भी विचार किया जा रहा है। टीबी की तीनों दवा के साथ-साथ नहीं लेने से उनका असर नहीं होता है, इस बारे में भी जागरूक करने की जरूरत है।
- डॉ. अमिता नेने, मुंबई