फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

चौथे स्टेज के कैंसर से ग्रस्त पेट का 20% हिस्सा निकाल मरीज को दी नई जिंदगी

Wed, 08 Feb 2017 11:11 AM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
विज्ञापन
डेमो प‌िक
विज्ञापन
लोहिया संस्थान के डॉक्टरों ने सात घंटे की सर्जरी कर कैंसर से जूझ रही महिला को नई जिंदगी दी। महिला की हालत बहुत सीरियस थी। संस्थान के सर्जन डॉ. आकाश अग्रवाल ने बताया कि सीटी स्कैन जांच रिपोर्ट देखने के बाद पता चला कि पित्त की थैली का कैंसर पेट के कई दूसरे हिस्सों में फैल गया है और चौथे स्टेज में है। 
विज्ञापन


गनीमत इस बात की थी कि कैंसर अलग-अलग नहीं फैला था। इसे देखते हुए सर्जरी प्लान की गई। 23 जनवरी को ऑपरेशन किया गया। पेट का 20 फीसदी हिस्सा बाहर निकाल कर उसे रिपेयर किया गया। 

डॉ. आकाश का दावा है कि संस्थान में इस तरह की पहली सर्जरी की गई है। मरीज अब बेहतर है। बीते चार फरवरी को उसे डिस्चार्ज कर दिया गया। जरूरी जांचों के बाद कीमोथेरेपी शुरू की जाएगी।
विज्ञापन


डॉ. आकाश ने बताया कि संस्थान में सर्जरी का कुल खर्च करीब 75 हजार रुपये आया, जबकि निजी सेंटर में पांच लाख तक रुपये खर्च करने पड़ते। मेडिकल की दुनिया में इस सिचुएशन को ‘हिपैटो पैन्क्रियाटिको डियोडेनेक्टमी विद कोलोनिक रिसेक्शन’ कहा जाता है।
विज्ञापन

ये भी जानें

डेमो प‌िक - फोटो : अमर उजाला
केस स्टडी : पित्त की थैली (गॉल ब्लैडर) में स्टोन के कारण जब पेट दर्द असहनीय हो गया तो फैजाबाद की कुसुम देवी (40) लोहिया संस्थान पहुंचीं। सीटी स्कैन में कैंसर का पता चला। पित्त की थैली का कैंसर पेट, लिवर, पैंक्रियाज, छोटी और बड़ी आंत तक फैल गया था। डॉक्टरों ने सात घंटे की सर्जरी के बाद पेट के भीतर अलग-अलग कैंसरग्रस्त हिस्से को निकाल कर बचे हुए अंग को रिपेयर कर दिया। अब मरीज बेहतर है, उसे डिस्चार्ज कर दिया है।

जानिए, जो अंग रिपेयर किए गए, उनका काम क्या है...
लिवर : इसमें खाना को पचाने वाले एंजाइम्स बनते हैं।
पेट : यहां खाना स्टोर होता है। पेट का 75 फीसदी हिस्सा निकाला जा सकता है।
पैंक्रियाज हेड : जूस बनाता है जिससे खाने को पचाने वाले इंजाइम्स बनते हैं।
पित्त की नली : लिवर से छोटी आंत में एंजाइम्स पहुंचाती है।

2.4 फीसदी मरीजों को ऐसी समस्या
डॉ. आकाश अग्रवाल बताते हैं कि गॉल ब्लैडर (पित्त की थैली) के कैंसर के मामलों में इस तरह के मामले केवल 2.4 फीसदी ही होते हैं। इस केस में अच्छा ये रहा है कि कैंसर का फैलाव आसपास के हिस्सों में थे, जिसे अलग किया गया। एक भी गांठ किसी भी अंग के दूर के हिस्से में होती तो ये सर्जरी संभव नहीं थी। 

ये रहे सर्जरी टीम में शामिल
कैंसर सर्जन डॉ. आकाश अग्रवाल के साथ डॉ. विवेक, डॉ. अंकुर, डॉ. नवनीत और डॉ. वीरेंद्र की टीम रही। सर्जरी में पैरामेडिकल स्टाफ रेनू, नमिता, शालू और प्रियंका शामिल रहीं। संस्थान के निदेशक डॉ. दीपक मालवीय और एमएस डॉ. सुब्रत चंद्रा ने टीम को सर्जरी के लिए बधाई दी।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें