लविवि का अनुदान फ्रीज होने की वजह से हमेशा आर्थिक तंगी बनी रहती है। एलएलबी ऑनर्स पाठ्यक्रम में हर साल दाखिले के लिए मारामारी रहती है। 10 सेमेस्टर के इस पाठ्यक्रम में स्टूडेंट्स से प्रति सेमेस्टर 25 हजार से ज्यादा फीस ली जाती है।
120 सीटों के हिसाब से कोर्स में एक समय में अधिकतम 600 स्टूडेंट्स हो सकते हैं। इस हिसाब से विवि को इस पाठ्यक्रम से सालाना डेढ़ करोड़ रुपये की राशि फीस से मिलती है। बीबीए-एलएलबी शुरू होने पर यह राशि दोगुनी हो सकती थी।
320 के बजाय सिर्फ 120 सीटों पर हो रहे दाखिले
विवि में मौजूद दस्तावेज के अनुसार लविवि को वर्ष 2001 में पांच साल के लिए 1600 सीटों के लिए मान्यता मिली थी। इस लिहाज से लविवि हर साल 320 सीटों पर दाखिला ले सकता है। इसके बावजूद यहां पर सिर्फ 120 दाखिले ही हो रहे हैं।
‘अमर उजाला’ द्वारा यह मुद्दा उठाने पर लविवि ने सीट संख्या का निर्धारण करने से पहले बीसीआई से सलाह लेने की बात कही थी। इसके बावजूद विवि ने न तो बीसीआई को पत्र लिखा और ना ही अपने यहां सीट संख्या ही बढ़ाई। इस पर लविवि प्रशासन का कहना है कि पाठ्यक्रम के लिए संविदा पर शिक्षकों की नियुक्ति के बाद इस पर फैसला किया जाएगा।
विधि संकाय के डीन प्रो. आरके सिंह का कहना है कि बीबीए-एलएलबी पाठ्यक्रम का प्रस्ताव तैयार किया गया था, लेकिन इस पर सहमति नहीं बन सकी है। इसलिए हमने फिलहाल यह प्रस्ताव स्थगित कर दिया है। एलएलबी की सीटें बढ़ाने पर फैसला संविदा शिक्षकों की नियुक्ति के बाद ही किया जाएगा।
सीटों की जानकारी मांगी है
लविवि के कुलपति प्रो. एसपी सिंह का कहना है कि एलएलबी ऑनर्स की सीटें बढ़ाने के लिए डीन को निर्देश दिया गया है। इस पर उन्होंने क्या फैसला किया, इसकी सूचना नहीं मिली है। सीट बढ़ाने के संबंध में क्या स्थिति है, इसकी जानकारी मांगी जा रही है।