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क्या अखिलेश के मंत्रिपरिषद में नए चेहरों को मिलेगी तरजीह

Thu, 29 Oct 2015 10:17 PM IST
कुमार भवेश चंद्र/अमर उजाला, लखनऊ
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अखिलेश यादव छठी बार अपने मंत्रिपरिषद में फेरबदल करने जा रहे हैं तो नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या वे अपनी टीम में नए और साफ-सुथरी छवि के लोगों को तरजीह देंगे?
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2017 के आम चुनाव में जाने से पहले उनके लिए शायद यह बड़ा मौका है जब वे अपनी सरकार की एक नई और बेहतर तस्वीर पेश कर सकते हैं। युवा मुख्यमंत्री होने के नाते उम्मीद यही की जा रही है कि वे इस दिशा में एक और मजबूत कदम रखेंगे।

शुरुआत से ही उम्मीद की जा रही थी कि खुद मुख्यमंत्री के युवा होने की वजह से मंत्रिपरिषद में फ्रेश सियासी चेहरों को तरजीह मिलेगी, लेकिन प्रदेश को अभी तक इसका इंतजार ही रहा।
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महिलाओं को पार्टी में आगे बढ़ाने को लेकर सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की सोच की झलक भी मंत्रिपरिषद में नई दिखती। अभी तक अखिलेश मंत्रिपरिषद में केवल एक महिला को ही जगह मिल पाई है।

मौजूदा मंत्रिपरिषद के कई मंत्रियों की छुट्टी कर और कुछ के विभाग वापस लेकर मुख्यमंत्री ने एक संकेत देने की कोशिश तो की है, लेकिन असली चुनौती उन मंत्रियों से निपटने की रहेगी जिन्हें न तो अपनी छवि की चिंता है न वे सरकार की छवि की परवाह करते हैं।

सपा सुप्रीमो सार्वजनिक मंचों से अखिलेश सरकार के कई मंत्रियों के कामकाज पर असंतोष जाहिर कर चुके हैं। जाहिर है मुख्यमंत्री के तौर पर अखिलेश यादव को उन चेहरों से भी छुटकारा पाना होगा जिनकी वजह से उनकी सरकार की किरकिरी होती रही है। वैसे भी अगले चुनाव में जाने से पहले अपनी सरकार की छवि को लेकर अंतिम कोशिश के लिए अखिलेश के पास व्यावहारिक रूप से केवल एक ही साल बचा है।
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सीनियर्स के दबाव में काम करने का लगता रहा है आरोप

नया साल आते आते उनके सरकार के कामकाज को लेकर आकलन का नया दौर शुरू हो जाएगा। आखिरी एक साल में उनकी सरकार की छवि चुनाव के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होगी। अब देखना है कि अखिलेश यादव मुख्यमंत्री के तौर पर इस बात को कितनी तरजीह देते हैं?

उनके ऊपर पार्टी और परिवार के सीनियर्स के दबाव में काम करने के आरोप लगते रहे हैं। कहा तो यहां तक जाता रहा है कि प्रदेश में एक नहीं, चार सीएम काम करते हैं। अखिलेश कहते भी रहे हैं कि पार्टी के बड़ों का वे आदर करते हैं और इसलिए उन पर ऐसे आरोप लगते हैं, लेकिन जाहिर है चुनावी साल में यह सवाल केवल उनके विरोधियों की ओर से नहीं होगा।

खुद मुख्यमंत्री इस बात पर बहुत जोर देते रहे हैं कि वे प्रदेश में किए गए अपने काम को लेकर जनता के बीच जाएंगे। लेकिन लखनऊ में आईटी सिटी, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे, मेट्रो और बुनियादी क्षेत्र में अन्य कामों को अपनी कामयाबी बताने वाले मुख्यमंत्री को नहीं भूलना चाहिए कि चुनाव में इन बातों के अलावा यह सवाल भी उठेंगे कि पिछले पांच साल में उनकी सरकार किस तरह चली? किन लोगों के साथ चली? उनके मंत्रियों का प्रदर्शन कैसा रहा?

समय-समय पर मंत्रियों और पार्टीजनों की अनुशासनहीनता की बात आने पर पार्टी और सरकार का रुख क्या रहा? सवाल यह भी पूछा जाएगा कि पांच साल में अखिलेश के रूप में पार्टी के नेतृत्व के लिए जहां नया चेहरा मिला, वहीं क्या उनके अलावा कुछ और चेहरों को पार्टी ने आगे बढ़ाया? वो कौन से नए चेहरे हैं जिनके नाम पर जनता एक बार फिर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनाने के लिए वोट कर सकती है?

क्या सत्ताधारी दल ने ऐसे नए चेहरे पैदा किए जिनके नाम पर वह एक बार फिर प्रदेश में शासन के लिए जनादेश मांग सकती है? ये ऐसे सवाल हैं जिनका सामना समाजवादी पार्टी और प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता पाने वाली अखिलेश सरकार को करना ही होगा?
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