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यूपी में दरक रहीं भाजपाई किले की दीवारें

Sun, 31 Aug 2014 08:51 PM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
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केंद्र में भाजपा की सरकार बने अभी सौ दिन ही पूरे हुए हैं और पार्टी नेता फिर पुरानी राह पर चलते दिखाई देने लगे हैं। नेताओं की महत्वाकांक्षा पार्टी की जीत पर भारी पड़ती दिख रही है।
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सांसदों पर जीत का नशा इस कदर हावी दिख रहा है कि वे जीत को निजी ताकत मान चुके हैं। पदाधिकारी, विधायक व प्रदेश के नेता भी पीछे नहीं। कार्यक्रमों का ऐलान तो हो रहा है, चुनाव के लिए एक के बाद एक जनप्रतिनिधि व नेताओं को जिम्मेदारी भी सौंपी जा रही है, पर उस पर अमल कराने की चिंता नहीं है।

खींचतान व गुटबाजी के हावी होने का मामला इसी एक घटना से समझा जा सकता है कि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी के सामने ही सहारनपुर में हंगामा हो गया। विरोधी दलों ने नहीं पार्टी कार्यकर्ताओं ने ही काले झंडे दिखा डाले। विरोध में नारे लगाए।
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पर, वाजपेयी जांच कराने के अलावा और कुछ नहीं बोल पाए। जो हाल है उसके चलते प्रदेश में विधानसभा चुनाव में भगवा किले की दीवारों के दरकने का खतरा खड़ा दिखाई देने लगा है।

एक-दूसरे के खिलाफ नारे लगा रहे भाजपाई

लोकसभा चुनाव में प्रदेश की 80 में 71 सीटें जीत भाजपा ने यूपी को भगवा किले में तब्दील कर दिया था तो माना गया था कि भाजपा का यूपी से वनवास ही नहीं खत्म हुआ है बल्कि लंबे समय तक कब्जा भी हो गया है।

पर, विधानसभा उपचुनाव में उतारे गए उम्मीदवारों को लेकर पार्टी के भीतर ज्यादातर सीटों पर आपसी टकराव के दृश्य इस धारणा को तोड़ रहे हैं।

एक-दूसरे के खिलाफ मुर्दाबाद के नारे लगाए जा रहे हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भले ही पहले यह कह दिया हो कि सांसद अपने परिवार के किसी सदस्य को टिकट मिलने की उम्मीद न करें, बावजूद इसके सांसदों में परिवार या किसी अपने को टिकट न मिलने की नाराजगी सतह पर दिख रही है।सांसद हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।

नहीं दिख रहा अमित शाह का असर

एक सप्ताह पहले लखनऊ आए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने जब यह कहा था कि उत्तर प्रदेश के लोग यह न समझें कि उन्हें इस कठोर प्रभारी (अमित शाह) से मुक्ति मिल जाएगी।

यूपी में भाजपा का परचम फहराए और पार्टी की सरकार बनाए उत्तर प्रदेश नहीं छोड़ूंगा, तो लगा था कि विधानसभा उपचुनाव के दौरान भी उनका असर दिखेगा।

पर, अभी तक ऐसा नहीं दिख रहा है। विधानसभा की उपचुनाव वाली सीटों पर घोषित किए गए प्रत्याशियों को लेकर सभी जगह कलह व खींचतान दिख रही है।

खुद अमित शाह भी सक्रिय नहीं

स्थानीय सांसदों को उम्मीदवारों की नैया पार लगाने की जिम्मेदारी शायद यह सोचकर सौंपी गई थी कि वे मददगार बनेंगे। पर, प्रभारी बनाए गए सांसदों में ही ज्यादातर पतवार को तोड़कर पार्टी उम्मीदवार की नैया डुबोने पर तुले हुए हैं।

ज्यादातर सीटों पर सांसदों के अभी तक दर्शन नहीं हुए हैं। नामांकन के दिन भी यह उम्मीदवार के साथ मौजूद नहीं दिखे। कुछ तो खुलकर विरोध भी कर रहे हैं। विधायक भी चुप्पी साधे बैठे हैं।

प्रदेश में लोकसभा चुनाव में भाजपा की वापसी का श्रेय लूटने वाले और यूपी की उपलब्धि से राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचे अमित शाह की सक्रियता भी नहीं दिख रही है।

इस तरह की खींचतान

हाल यह है कि सहारनपुर में तो भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी के सामने ही बवाल हो गया। वह भी किसी और के खिलाफ नहीं बल्कि उन्हीं के खिलाफ। पार्टी के एक गुट ने उनके मुर्दाबाद के नारे भी लगाए और काले झंडे भी दिखाए।

स्थानीय सांसद राघवलखन पाल सहारनपुर सीट के चुनाव के प्रभारी हैं। पर, वह प्रदेश अध्यक्ष से मिलने तक नहीं आए। बिजनौर में सांसद व उनके विरोधी गुट में मारपीट हुई।

ठाकुरद्वारा (मुरादाबाद) सीट के चुनाव प्रभारी स्थानीय सांसद सर्वेश सिंह हैं, पर वे भी वहां भाजपा प्रत्याशी के नामांकन में शामिल नहीं हुए। उनकी तरफ से तो यहां तक कह दिया गया है कि चुनाव के दौरान उनका आना मुश्किल है।
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सीटों पर दोबारा कब्जा करना मुश्किल

बलहा (बहराइच) सीट के उपचुनाव की प्रभारी स्थानीय सांसद सावित्री बाई फुले हैं। वे ही यहां से विधायक रही हैं। पर, फुले भी पार्टी प्रत्याशी के नामांकन में शामिल नहीं हुईं। सांसद बृजभूषण शरण सिंह और कीर्तिवर्धन सिंह भी नहीं दिखे।

लखनऊ पूरब की सीट के उपचुनाव में पार्टी की नैया पार लगाने की जिम्मेदारी देवरिया से सांसद कलराज मिश्र सहित सात सांसदों को सौंपी गई है। दो विधायक भी यहां लगाए गए हैं। पर, यहां के प्रत्याशी गोपाल टंडन के नामांकन में भी कोई नहीं दिखा।

निघासन (खीरी) के सांसद व इस सीट के प्रभारी अजय मिश्र टेनी भी पार्टी प्रत्याशी रामकुमार वर्मा के नामांकन में नहीं दिखे। सिर्फ सांसद ही नहीं सीटों पर लगाए गए विधायक व पार्टी पदाधिकारियों में भी ज्यादातर अभी घर बैठे हैं।

जो हाल है उसमें पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व यूं ही बैठा रहा तो भाजपा का अपने कब्जे वाली इन सीटों में कई पर दोबारा कब्जा कर पाना मुश्किल लग रहा है।
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