अलीगंज के प्लॉट नंबर एल-4/1 पर एकल आवासीय मानचित्र पास कर निर्माण जारी है। यह एक कॉर्नर प्लॉट है।
इसके पीछे का भूखंड भी बिल्डर ने खरीद लिया है और दोनों को मिलाकर अपार्टमेंट बनाया जा रहा है।
एलडीए स्टेडियम को जोड़ने वाली रोड के कुछ आगे पवार क्लीनिक के पास एक और कॉर्नर प्लॉट पर अपार्टमेंट का निर्माण हो रहा है।
तीन स्लैब डाली जा चुकी हैं। इसमें भी एक आवासीय मानचित्र पास करवाया गया है। ये उदाहरण तो महज बानगी भर हैं।
दरअसल एलडीए के कॉर्नर प्लॉट पर धड़ल्ले से अवैध अपार्टमेंट निर्माण कर बिल्डर चांदी काट रहे हैं। प्राधिकरण कर्मियों-अफसरों की शह पर बिल्डरों के हौसले बुलंद हैं।
दरअसल एलडीए का कॉर्नर प्लॉट एक प्रीमियम लोकेशन मानी जाती है। इसमें करीब 20 फीसदी अतिरिक्त भूमि आवंटी को मिलती है।
इसके साथ ही दो दरवाजे खोलने का रास्ता भी होता है। इसी सुविधा पर रहती है बिल्डरों की नजर। प्राधिकरण की कॉलोनियों में अधिकांश अवैध निर्माण इन्हीं कोने के प्लॉटों पर किए जा रहे हैं।
ऐसे मामले ज्यादा ट्रांस गोमती की कॉलोनियों में देखने को मिल रहे हैं। गोमती नगर विनयखंड में पिछले दिनों जो अवैध निर्माण एलडीए ने काफी दबाव के बाद सील किया, वह भी कॉर्नर प्लॉट पर ही किया गया है।
इसी तरह से अलीगंज, गोमती नगर और महानगर में भी कॉर्नर प्लॉटों का दुरुपयोग बिल्डर अवैध अपार्टमेंट बनाने में जम कर कर रहे हैं।
जबकि, प्राधिकरण के अभियंता जेब गर्म करते हैं और शिकायतों को लगातार अनदेखा कर के राजधानी में अवैध निर्माण को प्रश्रय दे रहे हैं।
कॉर्नर प्लॉट बिल्डरों की नजर में हैं। रीसेल पर आवंटियों को मुंहमांगी कीमत देकर इनको खरीदा जा रहा है।
एक के साथ में अगर उसके बगल का या पीछे वाला प्लॉट मिल जाता है, तो बिल्डरों के लिए सोने पर सुहागा साबित होता है।
दोनों प्लॉटों को जोड़ कर अवैध अपार्टमेंट बनाए जा रहे हैं। कॉर्नर प्लॉट का साइज 150 वर्ग मीटर से लेकर 350 वर्ग मीटर तक होता है।
इसमें अगर एक-एक प्लॉट और मिल जाए तो 16 से 24 फ्लैटों का अपार्टमेंट आसानी से बना लिया जाता है।
आवंटी को उसके प्लॉट के मार्केट रेट से दोगुना तक भुगतान कर के और साथ ही रहने के लिए एक या दो फ्लैट भी उसी अपार्टमेंट में दे दिए जाते हैं।
इससे आसानी से लोग अपना प्लॉट बेचने के लिए राजी हो जाते हैं। कुछ इसी तरह से गोमती नगर विनयखंड के 200 वर्ग मीटर प्लॉट पर अवैध निर्माण किया गया।
मिलीभगत का नतीजा
बिल्डरों और इंजीनियरों की इसी मिलीभगत का नतीजा है राजधानी में बढ़ता अवैध निर्माण का दायरा।
इससे राजधानी की ढांचागत जनसुविधाओं का अवैध दोहन किया जा रहा है। वैध बिल्डिंग बनाने वाले बेहाल हैं।
मगर चार मंजिल तक सामने खड़ी होती इमारतों को फील्ड में घूमने वाले अभियंता और सुपरवाइजर नहीं देख पाते हैं।
एक्सईएन एक्शन करते हैं। केवल शिकायत का इंतजार होता है। वह भी अगर प्रभावी व्यक्ति न हो तो शिकायत डस्टबिन के हवाले कर दी जाती है।
सचिव और उपाध्यक्ष स्तर का दबाव ही कुछ काम आता है। अवैध बिल्डिंगों के खिलाफ सख्त अभियान की हिदायत अभियंताओं को दी गई है।