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माया के स्मारकों में 500 करोड़ की लूट

Wed, 02 Jul 2014 12:11 PM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
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बसपा शासनकाल के दौरान दलित महापुरुषों के नाम पर प्रदेश की राजधानी लखनऊ व नोएडा में जो स्मारक बनवाए थे उसमें हर कदम पर लूट हुई।
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मंगलवार को विधानसभा में पेश की गई सीएजी रिपोर्ट में लखनऊ के चार व नोएडा के एक स्मारक के निर्माण में कदम दर कदम अनियमितताओं पर मुहर लगाई गई है।

रिपोर्ट में स्मारकों के निर्माण से जुड़े सलाहकारों, नौकरशाहों व निर्माण एजेंसियों की मिलीभगत उजागर हुई है जिससे शीर्ष नौकरशाहों की भूमिका एक बार फिर कटघरे में आ खड़ी हुई है।

इन स्मारकों की मुख्य कार्यदायी संस्था ने किस तरह सरकारी खजाने को 397 करोड़ रुपये की चोट पहुंचाई इसका भी खुलासा हुआ है।
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943 की योजना हो गई 4558 करोड़ की

पांचों स्मारकों की मूल लागत कुल 943.73 करोड़ रुपये थी जिसे बाद में संशोधित कर 4558.01 करोड़ पहुंचा दिया गया।

परियोजनाओं की आवश्यकता एवं औचित्य पर ध्यान नहीं दिया गया। मुख्य कार्यदायी संस्था यूपी राजकीय निर्माण निगम लि. के अविवेकपूर्ण वित्तीय प्रबंधन के कारण 10.53 कारण का अतिरिक्त व्यय किया गया।

राजकीय निर्माण निगम ने 500 करोड़ लुटवाए
मुख्य कार्यदायी संस्था राजकीय निर्माण निगम द्वारा दरों के अनुमोदन के लिए उच्चस्तरीय समिति से बिना अनुमोदन प्राप्त किए अधिकतर मदों की दरें खुद तय की गईं। बिना प्रतिस्पर्धा के उच्च दरों पर कार्य का आवंटन किए जाने से 397 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च हुए।

अलग-अलग विशेषता वाले कार्यों की पहचान किए बिना उच्च रेट पर ही काम सौंपे गए जिससे 18.41 करोड़ रुपये और भी खर्च हो गए। बलुआ पत्थर, म्यूरेल, फाउंटेन, व कैपिटल की खरीद, टेंडर प्रक्रिया व बिजली दरों का निर्धारण उचित तरीके से न किए जाने से भी करीब 50 करोड़ रुपये अधिक खर्च हुए।

जमकर हुई मनमानी

बसपा शासनकाल में प्रदेश सरकार ने वर्ष 2007-08 से 2009-10 के बीच राजधानी लखनऊ में डा. भीमराव अंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल, मान्यवर श्री कांशीराम जी स्मारक स्थल, बौद्ध विहार शांति उपवन, ईको पार्क तथा मान्यवर श्री कांशीराम जी ग्रीन इको गार्डन के निर्माण की स्वीकृति दी थी।

इसके अलावा अगस्त 2009 में नवीन ओखला औद्योगिक विकास प्राधिकरण ने राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थल एवं ग्रीन गार्डन के निर्माण की मंजूरी दी थी।

रिपोर्ट में बताया गया है कि इन स्मारकों के लिए भूमि की व्यवस्था, निर्माण के लिए एजेंसियों के चयन, टेंडर प्रक्रिया व पर्यावरण संबंधी प्रावधानों का उल्लंघन किया गया।

बिना किसी उचित अनुमोदन के भवन ढहाए गए और परामर्शियों के चयन में प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। सक्षम संस्थाओं से अनापत्ति प्रमाणपत्र व पर्यावरणीय अनुमति के आवेदन से पहले ही राजधानी के स्मारको के काम शुरू कर दिए गए। यही नहीं कार्यदायी संस्थाओं को अनुचित लाभ के खूब मौके उपलब्ध कराए गए।
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सलाहकार भी हुआ मालामाल

स्मारकों से जुड़े विस्तृत परामर्श व वास्तुकला से संबंधित सेवाओं के लिए परामर्शदाता का चयन किया जाना था। इसका चयन टेंडर के जरिए नहीं किया। बार-बार के कार्यों पर परामर्श व परियोजना लागत के गलत आकलन की वजह से परामर्शदाता को 2.31 करोड़ रुपये का अधिक भुगतान किया गया।

ड्राइंग व डिजाइन में बार-बार बदलाव की वजह से बने हुए भवनों का ढहाना पड़ा जिससे 29.62 करोड़ का नुकसान हुआ। कार्यों के गलत नियोजन की वजह से एक करोड़ का अतिरिक्त खर्च भी हुआ।

4.16 करोड़ के पेड़ कहां लगे पता नहीं
राजधानी की परियोजनाओं के बागवानी कार्य पर 17 करोड़, सजावटी पौधे पर 5.84 करोड़, घास का मैदान बनाने पर 10.76 करोड़ खर्च हुआ। पता चला कि छह महीने के बीच खरीदे गए पौधों की कीमत में 178 से लेकर 774 प्रतिशत का अंतर था।

पीपल, इमली, मौल श्री की खरीद निजी संस्थाओं से की गई जिसके रेट वन विभाग से 543 से 1329 फीसदी ज्यादा थीं। इनमें 4.16 करोड़ रुपये के पेड़ कहां लगे पता नहीं चला।
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