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कांग्रेस की बसपा पर ये मेहरबानियां दे रही कुछ खास संकेत

Thu, 07 Nov 2013 10:57 PM IST
मनोज श्रीवास्तव/लखनऊ
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पहले बसपा सुप्रीमो मायावती को आय से अधिक संपत्ति मामले में राहत।
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फिर इसी मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर नहीं कर मायावती की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया।

और अब इनकम टैक्स विभाग की ओर से मायावती के भाई आनंद कुमार के फ्रीज किए गए 400 करोड़ रुपये के फिक्सड डिपाजिट खाते को मुक्त कर देना ऐसे पुख्ता संकेत हैं कि लोग हाथ को हाथी के करीब आते देखने लगे हैं।

सूत्रों का कहना है कि दोनों दलों के बीच यूपी में सियासी गठजोड़ के नफा नुकसान पर बातचीत अहम दौर में है।

अड़चन सीटों के बंटवारे पर है। दोनों दल समय की मांग महसूस करते हुए थोड़ा भी लचीला रुख अपनाएंगे तो बात बन जाएगी।

हालांकि, एक महीने पहले कांग्रेस सांसद पीएल पुनिया के एक कार्यक्रम में राहुल गांधी ने मायावती पर दलित नेतृत्व को न उभरने देने का आरोप लगाकर गठजोड़ की संभावनाएं कमोबेश खारिज कर दी थी।
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पर, इस बीच एक महीने में कुछ ऐसी स्थितियां उभरी हैं कि तालमेल को लेकर दोनों दल फिर उत्सुक बताए जा रहे हैं।

कानपुर, झांसी व बहराइच में नरेंद्र मोदी की रैलियों में उमड़ी भीड़ व अलीगढ़ व रामपुर में राहुल गांधी की रैलियों का फीकापन इस दोस्ती की पेंग आगे बढ़ाने के पीछे एक बड़ा कारण माना जा रहा है।

दोस्ती की संभावनाओं को हवा तब मिली जब हाल ही में अमेरिका से लौटते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सांप्रदायिक ताकतों को हराने के लिए सेकुलर ताकतों की एकजुटता पर जोर दिया।

कहा तो यह भी जा रहा है कि अगर कांग्रेस व बसपा के बीच कोई खिचड़ी पकती है तो चौधरी अजित सिंह का रालोद भी उसमें छौंक लगाकर गठबंधन का जायका बढ़ाने को बेताब है।

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति समझने वाले एक पूर्व विधायक कहते हैं कि यही समीकरण पश्चिम में अजित की लाज बचा सकता है।

मेरठ के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में प्रोफेसर डा. असलम जमशेदपुरी कहते हैं कि यदि यह तालमेल होता है तो पश्चिमी यूपी में मुसलमानों की प्राथमिकता सपा के बजाय कांग्रेस-बसपा गठजोड़ होगा।

मोदी लहर को मिल सकती है चुनौती
गोविन्द बल्लभ पंत इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंसेज के प्रोफेसर बद्रीनारायण कहते हैं कि बदली हुई परिस्थितियों में बसपा-कांग्रेस एलायंस ही नरेंद्र मोदी के उभार को चुनौती दे सकता है।

भाजपा के तमाम उभार के बावजूद यह गठजोड़ कई सीटों पर विनिंग काम्बीनेशन भी साबित हो सकता है।

बद्रीनारायण का मानना है कि अगर यह संभावित तालमेल साकार होता है तो दोनों ही दलों को फायदा होगा। किसी को थोड़ा ज्यादा तो किसी को कुछ कम।

दरअसल, इस संभावित गठजोड़ की तासीर न केवल पढ़े लिखे राजनीति विज्ञानी महसूस कर रहे हैं बल्कि बेनी प्रसाद वर्मा जैसे वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री भी लगातार वकालत कर रहे हैं।
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गौरतलब है, राहुल द्वारा मायावती की आलोचना के बावजूद बेनी ने अमर उजाला से कहा था- उनकी व्यक्तिगत राय है कि दोनों दलों में कोई समझौता हो जाए तो बेहतर होगा।

बेनी के एक समर्थक कहते हैं कि तालमेल होने पर ही कांग्रेस अपनी पुरानी सीटों को बचाने के बारे में सोच सकती है।

सपा और कांग्रेस जिस तरह एक दूसरे के प्रति हमलावर हुई हैं, उससे भी इस तालमेल की संभावनाएं बढ़ी हैं।
 तालमेल के समर्थकों का तर्क है कि मुजफ्फरनगर दंगों के बाद मुसलमानों का सपा से मन थोड़ा खटका है।

अगर तालमेल होता है कि दलित वोटों के मूलधन के साथ मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा इस एलायंस की ओर झुक सकता है।

यदि दलित-मुसलमान साथ आए तो सेकुलर हिन्दुओं का एक बड़ा वर्ग भी इसी एलायंस का दम भरता नजर आ सकता है।

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