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हार के बावजूद मायावती की दबंगई, नहीं मानी हार

Sun, 18 May 2014 06:47 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
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चुनाव परिणामों में मुंह की खाने के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती ने हार नहीं मानी। उनका कहना है कि पार्टी ने ब्राह्मण वोटों का एक हिस्सा पाने में सफलता पाई।
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बसपा को भले ही एक सीट न मिली हो लेकिन मायावती का कहना है कि उन्हें ब्राह्मण वोटों का एक हिस्सा मिला है जो कि सुखद संकेत है।

हालांकि ओवर आल पार्टी को सिर्फ 19 फीसदी वोट मिला लेकिन पार्टी कोई भी सीट जीतने में कामयाब नहीं हो सकी।

2007 में पार्टी को 30 फीसदी वोट मिले थे। जिसके बाद लगातार पार्टी का जनाधार कम होता गया।
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टूट चुका है पार्टी का मनोबल

हालांकि राजनीतिक पंडितों का कहना है कि मायावती और उनकी पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट चुका है।

इसलिए वह ऐसे बयान दे रही हैं। इस चुनाव में पार्टी अपना परंपरागत वोट बैंक भी रोक पाने में असफल रही। बसपा का दलित वोट भाजपा के खाते में गया।

गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी ने भी चुनाव प्रचार के दौरान दलितों और पिछड़ों को खुद से जोड़ने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

यहां तक कि मोदी ने एक रैलियों में खुद को पिछड़ी जाति का भी बताया।

लगातार घटती गई ताकत

सत्ता में रहते 2009 के लोकसभा चुनाव में बसपा की ताकत घटने का जो सिलसिला शुरू हुआ था, सत्ता खोने के बाद इस चुनाव में लोकसभा की सारी सीटें गंवाने तक पहुंच गया।

मतदाताओं की बढ़ती संख्या के बीच वोट बैंक में छह फीसदी से बड़ी गिरावट बसपा के लिए बड़ी चुनौती का सबब बन गई है।

लखनऊ से लेकर दिल्ली तक बदले सियासी माहौल में बसपा को खोई सियासी ताकत वापस पाना आसान नहीं रह गया है।

उम्मीद से उल्टा हुआ परिणाम

वर्ष 2007 में अपने बलबूते सत्ता में आने के बाद बसपा की ताकत में इजाफा की उम्मीदें थीं लेकिन हुआ इसका उलटा।

पार्टी सुप्रीमो मायावती के सत्ता में रहते 2009 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की किसी तरह एक सीट तो बढ़ गई लेकिन वोट शेयर घटना शुरू हो गया।

इसमें सुधार की कोई कारगर रणनीति वे नहीं बना सकीं और पांच साल की हुकूमत में साढ़े चार फीसदी से ज्यादा मत खोकर 2012 में सरकार गवां बैठीं।
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विरोधियों की साजिश में फंसे

विधानसभा चुनाव में मिली पराजय के बाद मायावती ने कहा था, सरकार में व्यस्तता की वजह से वह संगठन को ज्यादा वक्त नहीं दे पाईं।

पार्टी के बाकी लोग विरोधियों की साजिश का अंदाजा नहीं लगा सके जिससे पार्टी को हार का सामना करना पड़ा।

पर अब तो उनके पास इस बहाने का भी रास्ता नहीं बचा। पिछले पूरे दो साल से वह खोई जमीन पाने की कोशिशों में लगी रहीं, पर कामयाबी नहीं मिली।
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