लखनऊ। तीन दिन... ना नेटवर्क, ना कोई खबर... बंद कमरों में कैद 28 जायरीन हर आती-जाती आवाज पर चौंकते रहे। बाहर जंग का तनाव, भीतर अपनों की याद और दिल में अनहोनी का डर। ईरान के कुम शहर में फंसे इन जायरीन के लिए हर लम्हा भारी था। किसी को नहीं पता था कि वापसी कब और कैसे होगी। डर ऐसा था कि नींद तक रूठ गई थी। अपनों से बात न हो पाने की बेचैनी ने सबका चैन छीन लिया था। वतन वापसी के बाद अमर उजाला से दिल्ली से बस द्वारा लौटते समय फोन पर हुई बातचीत में कुछ इसी तरह की दास्तां जायरीन ने सुनाई। हालांकि, सभी ने संकट की उस घड़ी में भारतीय दूतावास की व्यवस्थाओं की मुक्त कंठ से सराहना भी की।
Iमैं अपनी पत्नी हाशमी बानों रिजवी और 10 महीने की बेटी फातिमा मरियम के साथ जियारत के लिए ईराक और ईरान गया था। 28 लोगों के ग्रुप में मेरी बेटी सबसे छोटी थी। युद्ध के कारण 18 जून को वापसी नहीं हो सकी। नेटवर्क नहीं होने से तीन दिन तक घर वालों से संपर्क नहीं हो सका। हम सभी डर के साये में जी रहे थे, लेकिन दिल को तसल्ली देने के लिए एक दूसरे को संभालते रहे।I
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- रियाजुल हसनI
Iजिस होटल में हम लोगों को रखा गया था, वहां से बाहर निकलने की इजाजत नहीं थी। बंद दरवाजों से रात में मिसाइलों की आवाज से रूह कांप जाती थी। भारतीय दूतावास की व्यवस्थाएं बेहतर थीं, लेकिन घर वालों से संपर्क नहीं होने से रात आंखों में कटती थी।I
I- अलमास रिजवीI
Iयुद्ध के कारण सभी चिंतित थे। तीन दिन तक कोई होटल से बाहर नहीं निकला। हालात को लेकर जेहनी तौर पर सभी परेशान रहे, लेकिन जिश्मानी तौर पर भारत सरकार ने कोई दिक्कत नहीं होने दी। हम लोगों को गैर जगह पर भी गैरियत और तनहाई का अहसास नहीं होने दिया। I
I - मौलाना नदीम असगरI