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असम से मिली ताकत का यूपी में भरपूर इस्तेमाल करेगी भाजपा

Fri, 20 May 2016 01:54 AM IST
कुमार भवेश चंद्र/अमर उजाला, लखनऊ
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पांच राज्यों के चुनावी नतीजों ने उत्तर प्रदेश की सियासी संभावनाओं में नए रंग घोल दिए हैं। असम चुनाव में शानदार जीत बीजेपी के लिए यूपी के सियासी समर में संजीवनी से अधिक असरकारक साबित हो सकती है।
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असम के अलावा अन्य प्रदेशों में भले ही भाजपा को कोई उल्लेखनीय कामयाबी नहीं मिली है लेकिन प्रदेश के सिंहासन के रेस में कल तक तीसरे नंबर पर मानी जाने वाली इस पार्टी के लिए यह नतीजा नई संभावनाओं के द्वार खोल सकती है।

असम की जीत से इस पार्टी को यूपी चुनाव के लिए एक नैतिक बल मिल गया है। बिहार चुनाव में करारी हार की तोहमत झेल रही भाजपा के लिए अपने विरोधियों का सामना करना अब आसान हो गया है। या यों कहें कि बीजेपी विरोधियों के हाथों से अब यह हथियार छिन गया है।
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भाजपा को भले ही पांच राज्यों में से महज एक राज्य में ही कामयाबी हासिल हुई है पर दो राज्यों में कांग्रेस नीत सरकारों की हार से प्रदेशों में गैर कांग्रेसी सरकार की उसकी मुहिम को ताकत ही मिली है। इस स्थिति का भी बीजेपी कार्यकर्ता यूपी के चुनाव में भरपूर इस्तेमाल करेंगे, इसमें कोई दो राय नहीं है।
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कांग्रेस के लिए यूपी में नहीं बन पा रही है कोई उम्मीद

असम जैसे मुस्लिम बहुल प्रदेश में अपनी जीत को बीजेपी अपनी विशेष ताकत के तौर पर इस्तेमाल करेगी। उत्तर प्रदेश में भी भाजपा विरोधी दलों सपा और बसपा की ताकत मुस्लिम मतदाता ही माने जाते हैं।

ऐसे में असम की इस जीत को अब वह खुद को मुस्लिम विरोधी बताए जाने के काट के तौर पर इस्तेमाल कर सकेगी। भाजपा असम में अपनी जीत के अलावा अन्य राज्यों में कांग्रेस की पराजय को भी भुनाने का भरपूर प्रयास करेगी।

पांच राज्यों में कांग्रेस की नीतियों और नेतृत्व की करारी हार भी उसकी ताकत बन गई है। इन राज्यों में कांग्रेस की विफलता भाजपा के लिए फलदायी रहने वाली है। इन राज्यों में दुर्गति के बाद यूपी में कांग्रेस के लिए संभावनाएं लगभग शून्य हो गई हैं।

कांग्रेस ने न केवल दो राज्यों केरल और असम में अपनी सरकारें खो दी हैं बल्कि पश्चिम बंगाल में अपने एलांयस की विश्वसनीयता पर भी बट्टा लगा दिया है। छोटे से राज्य पुडुचेरी में जरूर कांग्रेस ने अपनी लाज बचा ली है।

पर, दो बड़े प्रदेशों में जनाधार सिमट जाने के बाद यूपी में उठने की कोशिश कर रही कांग्रेस की मुहिम की गति क्या होगी, इसका अनुमान लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं। इन नतीजों ने निश्चित ही कांग्रेस के नेतृत्व, नीतियों और नीयत को सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया है।
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कांग्रेस दौड़ से बाहर, त्रिको‌णीय होगा मुकाबला

अभी तक यूपी में 2017 के चुनाव को चौतरफा मुकाबला वाला माना जा रहा था। लेकिन इन नतीजों के बाद यह महासंग्राम त्रिकोणीय सियासी युद्ध में तब्दील हो सकता है। यानी बसपा और भाजपा के रूप में केवल ही दो ताकतें समाजवादी पार्टी से सत्ता छीनने की दावेदार के तौर पर उभर सकती हैं।

पांच राज्यों के इन नतीजों का एक संकेत यह भी है कि काम करने वाली सरकारें सत्ता में वापसी कर रही हैं। ममता और जयललिता की वापसी को सत्तारूढ़ दल सपा शायद इसी नजरिए से देखे और दिखाने की कोशिश करे। लेकिन महिला नेतृत्व को दोबारा जनादेश मिलने को बसपा अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करे, इसमें भी शक नहीं।

महिला नेतृत्व के प्रति जनता के इस रुझान की वजह से भाजपा यूपी में किसी महिला चेहरे को आगे करके चुनाव मैदान में उतरे इसकी संभावना भी अब बढ़ गई है।

यूपी के सियासी मैदान में सभी दल अपनी रणनीति तय करने के लिए इन पांच राज्यों के नतीजों के अलग-अलग कोणों से विश्लेषण करें इसकी संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। लेकिन लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत जनता है। और सबसे अहम सवाल यही है कि इन नतीजों से सबक लेकर यूपी की जनता अपने लिए कैसा नेतृत्व चुनती है।
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