फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

नौवें प्रत्याशी को जिताकर बीजेपी ने किया गोरखपुर व फूलपुर का हिसाब बराबर

Sat, 24 Mar 2018 10:47 AM IST
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ
विज्ञापन
जीत के बाद जश्न मनाते सीएम योगी समेत बीजेपी के नेता।
विज्ञापन

भाजपा ने राज्यसभा चुनाव में अपने नौ उम्मीदवारों को जीत दिलाकर गोरखपुर और फूलपुर की पराजय का हिसाब बराबर कर लिया। इन नतीजों ने लोकसभा उपचुनाव में पराजय के बाद पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. महेंद्र नाथ पांडेय और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कद को बढ़ाने के साथ भगवा टोली को 2019 की चुनौतियों से पार पाने की मनोवैज्ञानिक बढ़त दे दी है।

विज्ञापन


हालांकि अब भी यह काम बहुत आसान नजर नहीं आता। भले ही राज्यसभा चुनाव जनता से सीधे न होते हों लेकिन इनके नतीजों ने भाजपा को जनता के बीच यह कहने का मौका दे दिया कि पार्टी के पक्ष में बयार बहनी अभी बंद नहीं हुई है।

साथ ही सपा और बसपा पर हमला करने का भी मौका दे दिया है। अभी अपनी पहली प्रतिक्रिया में बसपा की तरफ से सपा के साथ रिश्तों के और मधुर होने का संकेत दिया गया पर, वोट की गणित का ज्यादा विश्लेषण हुआ तो राज्यसभा के ये नतीजे दोनों के रिश्तों की कसौटी भी बन सकते हैं।

विज्ञापन

यह है वजह

सीएम योगी को माला पहनाकर खुशी जाहित करते बीजेपी नेता।
भाजपा अगर अपने आठ उम्मीदवार ही उतारती तो इस जीत का रणनीतिक महत्व न रहता। कारण, यह है कि रणनीतिकार अनिल अग्रवाल के रूप में अपने नवें उम्मीदवार को जिताकर सपा व बसपा के लोगों में अपने नेतृत्व को लेकर असहमति और मतभेद का संदेश देने में कामयाब रहे हैं।

राजनीति में संकेतों और संदेशों का ही मतलब होता है। ध्यान रखने वाली बात यह है कि राज्यसभा चुनाव में भाजपा से नवां उम्मीदवार आने के बाद ही लोकसभा के गोरखपुर व फूलपुर उपचुनाव के लिए बसपा की तरफ से सपा के समर्थन की घोषणा की गई थी।

बसपा सुप्रीमो मायावती ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि सपा और कांग्रेस अपने वोट दिखाकर उन्हें देगी। इसका मतलब साफ था कि बसपा के सपा का साथ देने की वजह राज्यसभा चुनाव और उसमें भी भाजपा के नौ प्रत्याशी थे।

बसपा को लगा कि भाजपा के नौ उम्मीदवार होने से सपा व कांग्रेस के सहयोग के बिना वह अपने किसी भी व्यक्ति को राज्यसभा नहीं भेज पाएंगी। ऐसे में तो उनकी और बसपा की प्रासंगिकता ही खत्म हो जाएगी।

नतीजे सपा व बसपा के रिश्तों की कसौटी 

भाजपा - फोटो : amar ujala
जिस तरह निर्दल विधायक रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया ने चुनाव में पूरे दिन रोमांच बनाए रखते हुए यह बोला, ‘मैं अखिलेश के साथ हूं’ का मतलब यह नहीं है कि बसपा के भी साथ हूं। इससे भाजपा को यह भी कहने का मौका मिल गया कि राजनीतिक कारणों से भले ही सपा-बसपा ने हाथ मिलाए हों पर दोनों पार्टियों के काफी लोगों और उनके दोस्तों को पता है कि जमीन पर इन दलों के समर्थकों का स्थानीय समीकरणों के नाते एक मंच पर आकर काम करना मुश्किल है।

यही नहीं तो आगे यह सवाल जरूर उठेगा कि सपा के सहयोग के बावजूद बसपा कैसे हार गई। साथ ही बसपा के महासचिव सतीश मिश्रा ने भाजपा को दलित विरोधी करार दिया और इस मुद्दे को गांव-गांव पहुंचाने का एलान किया। इससे भी साफ है कि बसपा ने अगर इस मुद्दे को धार दी तो सामाजिक ध्रुवीकरण होगा। उस स्थिति में भी सपा के लिए समस्या खड़ी होगी और इनके रिश्ते कसौटी पर होंगे।
विज्ञापन

भाजपा के लिए भी चुनौती

भाजपा - फोटो : amar ujala
भाजपा ने इतने वोट हासिल करके सभी विधायकों को अपने साथ जोड़े रखने में सफलता हासिल कर यह संदेश दे दिया है कि अधिकारियों और कामों को लेकर भले ही उनमें कुछ नाराजगी हो लेकिन उसका कोई लाभ सपा तथा बसपा को मिलने वाला नहीं है।

बावजूद इसके उसके सामने यह चुनौती भी है कि सपा, बसपा और कांग्रेस एक होकर 2019 के लिए जुटे तो उसे और ज्यादा ताकत से तैयारी करनी होगी। साथ ही जिस तरह उसके सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के दो विधायकों के क्रॉस वोटिंग करके बसपा को वोट देने की बात सामने आ रही है, उसके नाते भी लोकसभा चुनाव की तैयारी करनी होगी। 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें