सीएम योगी को माला पहनाकर खुशी जाहित करते बीजेपी नेता।
भाजपा अगर अपने आठ उम्मीदवार ही उतारती तो इस जीत का रणनीतिक महत्व न रहता। कारण, यह है कि रणनीतिकार अनिल अग्रवाल के रूप में अपने नवें उम्मीदवार को जिताकर सपा व बसपा के लोगों में अपने नेतृत्व को लेकर असहमति और मतभेद का संदेश देने में कामयाब रहे हैं।
राजनीति में संकेतों और संदेशों का ही मतलब होता है। ध्यान रखने वाली बात यह है कि राज्यसभा चुनाव में भाजपा से नवां उम्मीदवार आने के बाद ही लोकसभा के गोरखपुर व फूलपुर उपचुनाव के लिए बसपा की तरफ से सपा के समर्थन की घोषणा की गई थी।
बसपा सुप्रीमो मायावती ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि सपा और कांग्रेस अपने वोट दिखाकर उन्हें देगी। इसका मतलब साफ था कि बसपा के सपा का साथ देने की वजह राज्यसभा चुनाव और उसमें भी भाजपा के नौ प्रत्याशी थे।
बसपा को लगा कि भाजपा के नौ उम्मीदवार होने से सपा व कांग्रेस के सहयोग के बिना वह अपने किसी भी व्यक्ति को राज्यसभा नहीं भेज पाएंगी। ऐसे में तो उनकी और बसपा की प्रासंगिकता ही खत्म हो जाएगी।
जिस तरह निर्दल विधायक रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया ने चुनाव में पूरे दिन रोमांच बनाए रखते हुए यह बोला, ‘मैं अखिलेश के साथ हूं’ का मतलब यह नहीं है कि बसपा के भी साथ हूं। इससे भाजपा को यह भी कहने का मौका मिल गया कि राजनीतिक कारणों से भले ही सपा-बसपा ने हाथ मिलाए हों पर दोनों पार्टियों के काफी लोगों और उनके दोस्तों को पता है कि जमीन पर इन दलों के समर्थकों का स्थानीय समीकरणों के नाते एक मंच पर आकर काम करना मुश्किल है।
यही नहीं तो आगे यह सवाल जरूर उठेगा कि सपा के सहयोग के बावजूद बसपा कैसे हार गई। साथ ही बसपा के महासचिव सतीश मिश्रा ने भाजपा को दलित विरोधी करार दिया और इस मुद्दे को गांव-गांव पहुंचाने का एलान किया। इससे भी साफ है कि बसपा ने अगर इस मुद्दे को धार दी तो सामाजिक ध्रुवीकरण होगा। उस स्थिति में भी सपा के लिए समस्या खड़ी होगी और इनके रिश्ते कसौटी पर होंगे।
भाजपा ने इतने वोट हासिल करके सभी विधायकों को अपने साथ जोड़े रखने में सफलता हासिल कर यह संदेश दे दिया है कि अधिकारियों और कामों को लेकर भले ही उनमें कुछ नाराजगी हो लेकिन उसका कोई लाभ सपा तथा बसपा को मिलने वाला नहीं है।
बावजूद इसके उसके सामने यह चुनौती भी है कि सपा, बसपा और कांग्रेस एक होकर 2019 के लिए जुटे तो उसे और ज्यादा ताकत से तैयारी करनी होगी। साथ ही जिस तरह उसके सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के दो विधायकों के क्रॉस वोटिंग करके बसपा को वोट देने की बात सामने आ रही है, उसके नाते भी लोकसभा चुनाव की तैयारी करनी होगी।