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विधानसभा, निकाय चुनाव के बाद यहां से भी सपा के सफाए की तैयारी में जुटी भाजपा

Sun, 17 Dec 2017 01:47 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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बीजेपी
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विधानसभा और निकाय चुनाव में सफलता के बाद भाजपा ने अब सहकारी संस्थाओं से सपाइयों के सफाए की तैयारी शुरू की है।
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पार्टी रणनीतिकारों की कोशिश है कि एक पखवारे बाद शुरू हो रहे सहकारिता चुनाव में प्राथमिक से लेकर शीर्ष सहकारी संस्थाओं तक में सपाइयों को हटाकर भाजपाइयों को लाया जाए ताकि यहां भी भाजपा का झंडा फहर जाए।

इसके लिए पार्टी ने पूरी ताकत झोंक दी है। प्रदेश स्तर से लेकर ब्लॉकों तक चुनाव संचालन समितियां बन गई हैं। जिलों में प्रभारी बनाकर उन्हें स्थानीय स्तर पर इन चुनाव की तैयारियों की जिम्मेदारी सौंपी जा चुकी है।
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भाजपा ने अब तक सहकारी समितियों के कितने सदस्य बना लिए, इसका पूरा आंकड़ा तो अभी उपलब्ध नहीं है। पर, सूत्रों के अनुसार, लगभग दो लाख सदस्य बनाए जा चुके हैं।

चुनाव के लिए प्रत्येक जिले में सहकारिता के जानकार किसी वरिष्ठ नेता को प्रभारी बनाने के साथ ही समितियां बना दी गई हैं। ये नए सदस्यों को सहकारी संस्थाओं का चुनाव लड़ने के दांव-पेंच सिखा रहे हैं।

यही नहीं, बसपा और सपा ने जिस तरह नियमों में बदलाव कर अपने लोगों को सहकारी संस्थाओं में बैठाया था, उसी राह पर चल कर भाजपा भी सत्ता में होने का लाभ उठाते हुए पार्टी के लोगों के लिए रास्ता खोल रही है।

इस तरह हो रही है तैयारी 

सीएम योगी आदित्यनाथ
भाजपा के रणनीतिकार जानते थे कि लगभग 14 वर्ष सत्ता से बाहर रहने के कारण पार्टी के तमाम कार्यकर्ताओं के लिए सहकारी समितियों का सदस्य बन पाना मुश्किल है। इसलिए उन्होंने सरकार के स्तर पर उन नियमों में कुछ बदलाव कराए हैं जिनसे भाजपाइयों के लिए रास्ता आसान हो सके।

अभी तक 120 दिन पुराना सदस्य ही सहकारी संस्थाओं के चुनाव में मतदाता हो सकता था और चुनाव लड़ सकता था। पर, अब यह समय सीमा 45 दिन कर दी गई है। अब 45 दिन पहले समिति का सदस्य बना व्यक्ति भी मतदाता बन कर चुनाव लड़ सकता है।

अभी तक वही सदस्य समिति का सक्रिय सदस्य माना जाता था जिसका लगातार तीन वर्ष समिति से लेनदेन चलता रहा हो। अब यह प्रावधान खत्म कर दिया गया है। यह भी नियम बना दिया गया है कि किसी संस्था में लगातार दो बार डायरेक्टर रहा व्यक्ति तीसरी बार डायरेक्टर नहीं रह सकता।

जाहिर है, इससे सबसे ज्यादा प्रभावित सपा और बसपा के लोग होंगे। इनकी सफाई का रास्ता खुलेगा। वजह, सत्तापक्ष का होने के नाते यही लोग अभी तक डायरेक्टर थे। जब ये संस्था के डायरेक्टर नहीं हो पाएंगे तो सभापति, उप सभापति या डेलीगेट बनने का सवाल ही पैदा नहीं होता।

पार्टी की सक्रियता का कारण  

डॉ. महेंद्र नाथ पांडेय - फोटो : अमर उजाला
सहकारी संस्थाओं पर कब्जा भाजपा का पुराना सपना रहा है। रणनीतिकारों का मानना है कि जमीन पर स्थायी मजबूती के लिए भाजपा की पंचायतों, निकायों और सहकारी संस्थाओं की राजनीति में सक्रिय भागीदारी जरूरी है। बीच में जब पार्टी की स्थिति कमजोर थी, तब भी यह बात उठी थी कि मात्र संगठन का मजबूत ढांचा होना पर्याप्त नहीं है।

पंचायतों और सहकारी संस्थाओं के जरिये भी जमीनी स्तर पर अपने लोगों को खड़ा करना जरूरी है। इसकी वजह  समझी जा सकती है। गुजरात में सहकारिता आंदोलन की मजबूती और उसमें भाजपाइयों की सक्रिय भागीदारी से संगठन का जमीनी आधार मजबूत हुआ है।

भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इसे समझ रहा है। इसीलिए सहकारिता चुनाव में पूरी ताकत लगाई गई है। प्रदेश प्रभारी ओम प्रकाश माथुर तो कई बार पत्रकारों से कह चुके हैं कि भाजपा जिन राज्यों में पंचायत और सहकारिता चुनाव लड़ती है, वहां जमीनी संगठनात्मक ढांचा मजबूत रहता है।

ये हैं प्रमुख सहकारी संस्थाएं 


प्रारंभिक ऋण सहकारी समितियां- 7479, जिला सहकारी बैंक- 50, क्रय-विक्रय समितियां -258, सहकारी पूर्ति भंडार-1823, जिला सहकारी संघ-57, केंद्रीय उपभोक्ता भंडार-57, उपभोक्ता सहकारी संघ, उप्र कोऑपरेटिव बैंक,  उप्र कोऑपरेटिव यूनियन, प्रादेशिक कोऑपेटिव फेडरेशन, उप्र श्रम एवं निर्माण सहकारी संघ, उप्र विधायन एवं निर्माण सहकारी संघ, आलू विकास विपणन संघ (फर्रुखाबाद) सहित अन्य कई संस्थाएं।
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सहकारिता चुनाव पर गंभीर है भाजपा

हम पूरी गंभीरता से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। बीते 14 वर्षों में प्रदेश में सत्ता में बैठे लोगों ने सहकारी संस्थाओं को जेबी बना डाला। इससे सहकारिता आंदोलन काफी कमजोर हुआ। सहकारी संस्थाएं आर्थिक रूप से खस्ताहाल हो गईं। भाजपा की कोशिश है कि इनके संचालन में हिस्सा लेकर इन्हें जनोपयोगी बनाया जाए। ये पहले की तरह सशक्त और स्वावलंबी बनें। इसके लिए सभी जगह संगठन के लोगों की समितियां बनाई जा चुकी हैं। सदस्यता हो चुकी है। प्रभारियों की नियुक्ति भी हो गई है। हर ब्लॉक के लिए प्रभारी तय हो गए हैं। पूरा भरोसा है कि सहकारिता चुनाव में भी हमें समर्थन मिलेगा। इससे हम सहकारी संस्थाओं के जरिये किसानों की ज्यादा सेवा कर पाएंगे।   
 -विद्यासागर सोनकर, महामंत्री भाजपा, प्रभारी सहकारिता चुनाव
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