भाजपा सपना तो 2017 में प्रदेश की सत्ता हासिल करने का देख रही है, लेकिन संघर्ष से किनारा करती जा रही है। सदस्यता के अलावा दूसरे मुद्दे नेपथ्य में हैं। सरकार के खिलाफ लड़ाई सिर्फ कागजों व बयानों तक सिमटकर रह गई है।
यादव सिंह प्रकरण को छोड़ दें तो पिछले चार महीने में सरकार की किसी गलती व फैसले को भाजपा प्रदेशव्यापी मुद्दा नहीं बना पाई है।
ऐसा नहीं है कि इन चार महीनों में प्रदेश सरकार के खिलाफ भाजपा को कोई मुद्दा नहीं मिला।
सरकार ने कई गलतियां कीं, पर भाजपा इन्हें मुद्दा बनाकर जनता को जोड़ ही नहीं पाई। कहीं विरोध किया भी तो वह सिर्फ रस्मी बनकर रह गया।
यह है यूपी भाजपा का हाल
भाजपा ने ऐलान किया था कि पार्टी के कार्यकर्ता हर धान खरीद केंद्र पर जाएंगे। जहां कहीं किसानों का शोषण या धान खरीद में हीलाहवाली मिली तो दबाव डालकर किसानों का धान खरीदवाएंगे।
पर, लखनऊ में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी का कुछ कार्यकर्ताओं के साथ सिर पर धान की बोरी रखकर जिला प्रशासन को देने का मामला छोड़ दें तो भाजपा के कार्यकर्ता कहीं भी धान खरीद कराने के लिए धरना-प्रदर्शन करते नहीं देखे गए।
गन्ना किसानों को बकाया भुगतान दिलाने और गन्ना मूल्य 400 रुपये प्रति क्विंटल कराने की बातें सिर्फ नेताओं के बयानों तक सिमटकर रह गईं।
भूमि अधिग्रहण व सरकार की गलतियों पर भी नहीं बोली भाजपा
प्रदेश सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन कर जरूरी होने पर प्रत्येक जिले में सिंचित और बहुफसली भूमि का 20 प्रतिशत तक अधिग्रहण किए जाने का प्रावधान कर दिया।
उम्मीद थी कि भाजपा इसे मुद्दा बनाकर प्रदेश सरकार के खिलाफ बड़ी लड़ाई करेगी, पर पार्टी नेता हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। बिजली आपूर्ति पर भी भाजपा का विरोध सिर्फ कागजों तक ही सिमटकर रह गया।
आपराधिक घटनाओं पर भी नहीं जताया विरोध: राजधानी में पिछले चार महीनों में कानून-व्यवस्था को खोखला साबित करने वाली कई घटनाएं घटीं। लॉ स्टूडेंट गौरी श्रीवास्तव को टुकड़े-टुकड़े कर देने जैसी दिल दहला देने वाली वारदात हुई।
हत्या, लूट, डकैती व बलात्कार की घटनाएं भी घटीं, पर हर बार भाजपा का विरोध सिर्फ कागजी रहा। ज्यादा से ज्यादा विधानमंडल के सदनों में सरकार के खिलाफ वेल में आने तक ही सिमटा दिखा। पार्टी किसी घटना को बड़ा मुद्दा बनाने में सफल नहीं हुई।