दरअसल, विपक्ष की तरफ से खासतौर से सपा और कांग्रेस के नेता पिछले दिनों प्रदेश में बिकरू, प्रयागराज और हाथरस की घटनाओं को लेकर भाजपा सरकार से जनता का भरोसा उठने का दावा कर रहे थे । पूर्वांचल में ब्राह्मण व ठाकुरों के बीच वर्चस्व व टकराव की दावे विपक्ष की तरफ से हो रहे थे। बलिया में कोटे की दुकान आवंटन के दौरान हुई घटना को लेकर पिछड़ी जातियों के भाजपा से छिटकने के दावे भी विपक्ष की तरफ से हो रहे थे । कोरोना के कामों को लेकर भी सरकार पर हमले हो रहे थे ।
हाथरस को लेकर राहुल और प्रियंका गांधी सड़कों पर दिखे और योगी सरकार की विदाई के दावे किए। रालोद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयंत चौधरी का मुखर विरोध भी सामने आया। सभी ने इस घटना को अनुसूचित जाति के सम्मान, स्वाभिमान से जोड़कर यह माहौल बनाने का प्रयास किया कि भाजपा सरकार में इस वर्ग की इज्जत सुरक्षित नहीं है।
उससे बड़े-बड़े राजनीतिक पंडित भी यह मान बैठे थे कि पश्चिम में खासतौर से जाट और अनुसूचित जाति का वोट भाजपा से छिटका है । ये निष्कर्ष तलाशे जाने लगे थे कि यह उपचुनाव में भाजपा को झटका दे सकते हैं। पर, नतीजों से ऐसा नहीं लगता। खासतौर से देवरिया में सपा के कद्दावर ब्राह्मण नेता ब्रह्माशंकर त्रिपाठी की भाजपा के नए चेहरे डॉ. सत्यप्रकाश मणि त्रिपाठी के हाथों करारी हार ब्राह्मणों के भाजपा के साथ ही होने का संकेत दे रही है ।
ये भी निकल रहे संदेश
भाजपा नेता अमित पुरी दावा करते हैं कि जनता समझ चुकी है कि विपक्ष के पास खोखले आरोप लगाने और नकारात्मक राजनीति करने के सिवाय कोई काम नहीं है। इसलिए उसने इन्हें सबक सिखाते हुए सिर्फ विरोध के लिए विरोध से बाज आने की नसीहत दी है । राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नतीजों ने साबित कर दिया कि जनता का समर्थन सरकार को बना हुआ है।
सेंट्रल फॉर दि स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड पॉलिटिक्स कानपुर के निदेशक डॉ. एके वर्मा कहते हैं कि विपक्ष जब तक मतदाताओं के रुझान और मन में आने वाले बदलाव को समझने की कोशिश नहीं करेगा तब तक यही होता रहेगा। उसे समझना होगा कि समाज में तो जातियों का प्रभाव रहेगा लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रणनीति धीरे-धीरे राजनीति से इसका प्रभाव खत्म कर रही है ।
पहले राजनीति में जाति काम करती थी लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने खुद को गरीबों के सरोकारों से जोड़कर व विकासवादी राजनीति को आगे करके उनकी आवश्यकताओं पर फोकस करके जो सिस्टम में बदलाव किए, विपक्ष इसे समझने में विफल रहा। गरीबों के खाते में सीधे धन पहुंचा, घर मिला, गैस मिली और कोरोना काल में मिले अनाज ने जातीय गोलबंदी तोड़ दी। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण में प्रधानमंत्री मोदी की कुशलता और भागीदारी को जनता का साथ मिला। डॉ. वर्मा की बात से साफ है कि जनता अब सिर्फ आरोपों की राजनीति में उलझने वाली नहीं है ।