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बिना मान्यता MBBS में एडमिशन, 150 छात्रों को दें 25-25 लाख रुपये: हाईकोर्ट

Tue, 08 Nov 2016 02:30 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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सुप्रीम कोर्ट की रोक और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की मान्यता के बगैर एमबीबीएस में 150 स्टूडेंट्स को दाखिला देने पर हाईकोर्ट ने सोमवार को डॉ. एमसी सक्सेना कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंस को जमकर फटकार लगाई।
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अदालत ने कॉलेज को छात्रों का साल बर्बाद करने का दोषी मानते हुए आदेश दिया कि वह हर छात्र को 25-25 लाख रुपये अदा करे। हालांकि हाईकोर्ट ने दूसरे कॉलेज में दाखिले की छात्रों की गुजारिश को ठुकरा दिया। कोर्ट ने कहा, उन्होंने ऐसी कोई अंडरटेकिंग नहीं दी हैं जिसमें उनके एडमिशन का भविष्य कोर्ट के आदेशों पर निर्भर होने की बात कही गई हो।

संस्थान ने सीधे-सीधे फ्रॉड किया
जस्टिस डॉ. देवेंद्र कुमार अरोड़ा ने यह फैसला दौडिया नारायण दिलीपभाई, स्मृति गंगवार, दीप्ति सिंह, रोशनी सक्सेना, अंशधा सिंह, असीम की याचिका पर दिया। जस्टिस डॉ. अरोड़ा ने कहा, कॉलेज के पास न तो मान्यता थी न ही यूपी स्टेट यूनिवर्सिटीज एक्ट 1973 के सेक्शन 37 के तहत संबद्धता। इन दोनों के बिना कोई भी कॉलेज किसी स्टूडेंट को एडमिशन नहीं दे सकता।
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केवल डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध यूनिवर्सिटी, फैजाबाद, ने कॉलेज को संबद्धता देने पर सैद्धांतिक सहमति दी थी, जिसके आधार पर एडमिशन दिए गए। यह सीधे तौर पर फ्रॉड है, और विद्यार्थियों के कॅरिअर से खिलवाड़ है। कॉलेज ने एडमिशन के लिए हाईकोर्ट के अंतरिम आदेशों के बाद 27 सितंबर को अखबार में एडमिशन का विज्ञापन निकाला और अगले ही दिन काउंसलिंग कर सभी एडमिशन कर डाले।

कॉलेज दो महीने में जमा करे 37.50 करोड़

याचिका में विद्यार्थियों ने चुकाई गई फीस का खुलासा नहीं किया था, ऐसे में हाईकोर्ट ने कहा कि प्रदेश सरकार ने एमबीबीएस कोर्स के लिए 11 लाख से 18 लाख रुपये की फीस तय की है।

अब कॉलेज 150 छात्रों को 25-25 लाख के हिसाब से 37.50 करोड़ रुपये दो महीने में महानिदेशक चिकित्सा शिक्षा के यहां जमा करे। इसमें स्टूडेंट्स को हुए नुकसान का कुछ मुआवजा भी शामिल है। महानिदेशक वेरिफिकेशन के बाद विद्यार्थियों को पैसा लौटाएंगे।

पैसा न दें तो डीएम करें वसूली
अगर कॉलेज पैसा नहीं दे पाता है तो लखनऊ के जिलाधिकारी इस रकम की वसूली भू-राजस्व के लिए तय प्रक्रिया के तहत करेंगे। पूरी प्रक्रिया को तीन महीने में पूरा करके अदालत को बताया जाए।
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एक ही दिन में गुजरात, हिमाचल, ओडिशा के छात्र कैसे पहुंच गए?

हाईकोर्ट ने सवाल किया कि 27 सितंबर को विज्ञापन देख अगले ही दिन गुजरात, ओडिशा, राजस्‍थान और हिमाचल के छात्रों ने एडमिशन कैसे ले लिया। विद्यार्थियों ने यह दूरी इनती तेजी से कैसे तय कर ली?

याचिका में इन बातों पर जानबूझ कर कुछ नहीं कहा गया है, क्योंकि अगर इसकी विस्तृत जानकारी दी जाती तो सामने आ जाता कि विद्यार्थियों की काउंसलिंग एक दिन में नहीं हुई, न ही एडमिशन लिए गए। काउंसलिंग निष्पक्ष, पारदर्शी और शो‌षणरहित ही तभी सही मानी जाती है।

कम मेरिट वाले छात्रों के पहले की दलील खारिज
हाईकोर्ट ने कहा कि डॉ. एमसी सक्सेना कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंस ने 27 सितंबर को काउंसलिंग का विज्ञापन निकाला, जबकि बाकी कॉलेजों में पहले ही काउंसलिंग हो गई थी, जहां उनसे कम मेरिट वाले विद्यार्थियों ने एडमिशन लिया। यह कैसे संभव है कि मेधावी विद्यार्थी रह जाएं और पीछे रैंक पाने वाले पहले एडमिशन पा जाएं?

इससे लगता है कि एडमिशन कायदों के अनुसार नहीं किए गए। इन हालात में याची को अधिकार नहीं है कि वे अन्य कॉलेजों में एडमिशन की राहत मांगें।
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