सपा सरकार को कानून-व्यवस्था सहित अन्य मुद्दों पर मिल रही बदनामी से फिलहाल निजात मिल गई है। भाजपा को इस बदनामी से निजात मिली है कि वह सूबे में कहीं लड़ाई में ही नहीं है।
परिक्रमा करने और रोकने को लेकर शुरू हुई कवायद के बाद मुलायम सिंह यादव एक बार फिर मुसलमानों के मसीहा और धर्मनिरपेक्षता के रक्षक के रूप में खड़े दिखाई दे रहे हैं।
वहीं, प्रदेश में हाशिए पर खड़ी भाजपा को विहिप और संघ की बदौलत हिंदुओं के बीच यह दावा करने का मौका मिल गया कि उनके हित की बात उनके अलावा दूसरा कोई नहीं उठाने वाला।
आगे क्या होगा? दोनों में कौन अपने मकसद में कितना कामयाब होगा, यह तो भविष्य केगर्भ में है। पर, फिलहाल तो दोनों ही खेमे यूपी में अपने मकसद में फौरी तौर पर कामयाब होते हुए दिख रहे हैं। परिक्रमा पर प्रतिबंध के बहाने सियासी गलियारों में अयोध्या एक बार फिर चर्चा में है।
समाजवादी पार्टी की सरकार धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के दावे के साथ परिक्रमा पर प्रतिबंध लगा चुकी है। परिक्रमा की जिद दिखा रहे विहिप और हिंदू नेताओं को अयोध्या से दूर रहने की और न मानने पर गिरफ्तारी की चेतावनी दी जा रही है।
जवाब में भगवा खेमे की तरफ से सरकार के इस कदम को हिंदू विरोधी नीति करार देकर हिंदुओं से मुस्लिम हितैषी राजनीतिक दलों व सरकारों को सबक सिखाने का आह्वान शुरू हो गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का निष्कर्ष है कि इस खेल के पीछे लोकसभा के आने वाले चुनाव में वोटों के इंतजाम को सपा व संघ परिवार की मिलीभगत है।
पर, सपा और संघ परिवार दोनों ही इसे अपने-अपने सिद्धांतों की रक्षा के लिए संघर्ष करार दे रहे है। माहौल कुछ वैसा ही बनाने की कोशिश है, जैसे 1990 में अक्टूबर से पहले दिखाई दे रहा था।