यूपी में पिछड़े किसको आगे बढ़ाएगें? यह सवाल इसलिए भी अहम है जिसको पिछड़ों ने आगे बढ़ाया, उसे ही सत्ता हासिल हुई। साल 2015 के पंचायत चुनाव के पहले रैपिड सर्वे की बात करें तो प्रदेश की आबादी में सबसे ज्यादा 54 फीसदी हिस्सेदारी पिछड़े वर्ग की है।
यह आंकड़ा साफ कर देता है कि प्रदेश की राजनीति में पिछड़ों का कितना अहम रोल होता है। शायद यही वजह है कि दलितों की राजनीति करने वाली बसपा हो या ‘सबका साथ-सबका विकास’ का नारा देने वाली भाजपा, सियासी ताकत बढ़ाने को बेताब कांग्रेस हो या सत्ताधारी दल समाजवादी पार्टी, सभी ने प्रदेश अध्यक्ष पिछड़ा वर्ग से ही बनाए हैं।
सामाजिक विश्लेषक प्रो. चौथीराम बताते हैं कि पिछड़ा वर्ग बहुत बड़ा है। पर, यह कभी एकजुट नहीं रह पाता है। यादव सहित कुछ जातियां सपा से जुड़ी हैं तो कुर्मी सहित कई जातियां भाजपा के साथ जुड़ी देखी जाती हैं। कुशवाहा बसपा के साथ खड़े नजर आते हैं।
हां, जिसके साथ ये ज्यादा हिस्से में जाते हैं, उसकी बात बन जाती है। पिछले चुनाव में तो सपा के साथ थे। पिछड़ों की सियासत पर नजर रखने वाले लौटन राम निषाद भी कहते हैं, प्रदेश में जिस दल को पिछड़ों का साथ मिला, उसी दल की सरकार बनी।
पूर्वांचल में इनका है वर्चस्व
डेमो पिक
- फोटो : amar ujala
पूर्वांचल में कुर्मी, निषाद, बिंद, राजभर, चौहान, मौर्य व कुशवाहा और पश्चिम में जाट, गूजर, लोधी, किसान, पाल, बघेल आदि पिछड़ों में अच्छे तादाद में हैं।
निषाद पूर्वांचल का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि इस क्षेत्र की 170 विधानसभा सीटों में ज्यादातर पर पिछड़े निर्णायक भूमिका निभाते हैं। 1991 में पिछड़ों ने भाजपा का साथ दिया तो 170 में उसे 97 सीटें मिलीं और उसकी सरकार बनी।
2007 में बसपा के खाते में पूर्वांचल से 102 सीटें आईं तो उसकी सरकार बनी। 2012 में जब अखिलेश यादव की सरकार आई तब इन्हें भी पूर्वांचल से रिकॉर्ड 106 सीटें मिली थीं। वे कहते हैं, हर दल पिछड़ों को ध्यान में रखकर अपनी चुनावी रणनीति बना रहा है। पर, यह सवाल सभी को मथ रहा है कि इस चुनाव में पिछड़े किसको आगे बढ़ाएंगे?
इस मोर्चे पर भाजपा की मुहिम सबसे तेज
शायद पिछड़े और पूर्वांचल ही मुख्य वजह रहे कि भाजपा ने ऐन चुनाव से पहले पिछड़े वर्ग और पूर्वांचल से ही प्रदेश अध्यक्ष बनाया। इस वर्ग को अपने पाले में लाने के लिए भाजपा, बसपा के पिछड़ा वर्ग के चेहरा रहे स्वामी प्रसाद मौर्य को भी पार्टी में ले आई।
स्वामी प्रसाद भी पूर्वांचल से ही ताल्लुक रखते हैं। अपना दल की अनुप्रिया पटेल को भाजपा अपने मंच पर मौका दे रही है और उनके दल का मंच साझा कर रही है।
केंद्रीय मंत्रिमंडल में अनुप्रिया को शामिल कर पिछड़ों को महत्व देने का संदेश भी दिया। राजभर समुदाय को साथ लाने के लिए इस समाज की पूर्वांचल के कई जिलों में प्रभाव रखने वाले ओम प्रकाश राजभर के दल को साथ मिला लिया।
प्रदेश भर में पिछड़ों को जोड़ने के लिए हर दो विधानसभा क्षेत्र पर एक पिछड़ा वर्ग सम्मेलन भी भाजपा ने कराया। भाजपा ने सूबे भर में परिवर्तन यात्रा निकाली तो प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य के साथ लोध समुदाय से ताल्लुक रखने वाली केंद्रीय मंत्री उमा भारती को भी आगे किया।
बसपा भी पीछे नहीं, लिए कई बड़े फैसले
पिछड़ों को अपने पाले में लाने की मुहिम में बसपा भी पीछे नहीं है। बसपा ने भी प्रदेश अध्यक्ष पिछड़े वर्ग के राजभर समुदाय से बना रखा है। स्वामी प्रसाद मौर्य के भाजपा में जाने के बाद से रामअचल पार्टी के पिछड़ा वर्ग के चेहरा हैं। वे अंबेडकरनगर से ताल्लुक रखते हैं।
इसके अलावा बसपा सुप्रीमो मायावती ने हाल में विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी के जो 402 प्रत्याशी उतारे उनमें 106 पिछड़े वर्ग से हैं। पिछड़े वर्ग को जोड़ने के लिए भाईचारा कमेटियां काफी समय से काम कर रही हैं। बसपा ने भी भाजपा के काट में हर जिले में पिछड़ा वर्ग सम्मेलन कराकर इस वर्ग को साधने की कोशिश की है।
सपा की सियासत ही पिछड़ा वर्ग पर केंद्रित रही
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व सपा सुप्रीमो मुलायम
समाजवादी पार्टी की सियासत ही पिछड़ा वर्ग पर केंद्रित रही है। यादव बेस वाली सपा ने पिछड़ों को लामबंद करने के लिए मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति को जिम्मेदारी सौंपी। एक रथ यात्रा भी निकाली। सपा जब भी सत्ता में रही पार्टी संगठन से लेकर सरकार तक में पिछड़ों की अहम भूमिका देखी गई।
मनोनयन और सरकार से स्तर से चयन होने वाले अहम पदों पर भी पिछड़ों का बोलबाला रहा। सपा के सियासी संग्राम के बीच मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपना प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम को बनाया। कुर्मी समुदाय के नरेश भी पिछड़ा वर्ग से ही आते हैं।
सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने चुनाव के पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा की सपा में वापसी कराई और राज्यसभा सदस्य बनाने के साथ राष्ट्रीय महासचिव पद से नवाजा। हालांकि सपा बंटती है तो पिछड़ों के झंडाबरदारों के भी विभाजित होने का खतरा है।
चुनाव से पहले पिछड़ों को रिझाने की कोशिश
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव
- फोटो : amar ujala
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चुनाव के ऐन पहले 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति वर्ग में शामिल करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।
इन जातियों में मल्लाह, केवट, कहार, निषाद, कुम्हार, प्रजापति, राजभर, कश्यप, तुरहा, गोड़िया, बिंद, भर,धीवर, धीमर, शिल्पकार, मंझवार, गोड़, बेलदार जैसी जातियां शामिल हैं।
हालांकि इस प्रस्ताव का भविष्य केंद्र सरकार पर निर्भर करता है। पूर्व में भी इस तरह का प्रस्ताव केंद्र को भेजा जा चुका है जिसे ठुकरा दिया गया था। लेकिन देखना होगा कि ये जातियां चुनाव के पहले इस फैसले को कैसे देखती हैं?
कांग्रेस ने भी सूबे का कप्तान पिछड़े वर्ग से ही बनाया
कांग्रेस अभी तक गठबंधन की आस में अपनी चुनावी रणनीति बहुत साफ नहीं कर पाई है। लेकिन चुनाव के पहले पार्टी के प्रदेश मुखिया की जिम्मेदारी जरूर पिछड़े वर्ग से आने वाले राज बब्बर को सौंप दी है। कांग्रेस में पूर्वांचल से पूर्व केंद्रीय मंत्री आरपीएन सिंह पिछड़ा वर्ग के प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं।
अचानक नीतीश शांत, कर चुके हैं पीएम मोदी की तारीफ
नीतीश कुमार
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देश में पिछड़े वर्ग की सियासत के एक प्रमुख चेहरा माने जाने वाले बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने कुछ महीने पहले तक प्रदेश में जगह-जगह जनसभाएं की। शराबबंदी के फैसले के बहाने वह सूबे के प्रमुख शहरों में पहुंचे।
पर, पिछले कुछ दिनों में यूपी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर अचानक वह शांत नजर आने लगे हैं। प्रधानमंत्री के नोटबंदी के अभियान की वह खुली प्रशंसा कर चुके हैं और प्रधानमंत्री भी नीतीश की तारीफ करते सुने गए हैं। नीतीश चुनाव भर शांत रहेंगे या आगे कदम बढ़ाएंगे, इसका अभी इंतजार ही है।
पिछड़ों को साधने चले क्षत्रप : भाजपा
केशव प्रसाद मौर्य प्रदेश अध्यक्ष, उमा भारती केंद्रीय जल संसाधन मंत्री, विनय कटियार सांसद, संतोष गंगवार केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री, ओम प्रकाश सिंह पूर्व प्रदेश अध्यक्ष, स्वतंत्र देव सिंह प्रदेश महामंत्री व स्वामी प्रसाद मौर्य पूर्व मंत्री।
इन दलों में ये है स्थिति
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव
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सपा
मुलायम सिंह यादव, सपा मुखिया
अखिलेश यादव, मुख्यमंत्री
प्रो. राम गोपाल यादव, राज्यसभा सांसद
शिवपाल सिंह यादव, पूर्व मंत्री
बेनी प्रसाद वर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री
गायत्री प्रसाद प्रजापति परिवहन मंत्री
नरेश उत्तम
बसपा
राम अचल राजभर प्रदेश अध्यक्ष
सुखदेव राजभर पूर्व विधानसभा अध्यक्ष
लालजी वर्मा पूर्व मंत्री
राम प्रसाद चौधरी पूर्व मंत्री
आरएस कुशवाहा पूर्व एमएलसी
पिछड़ी जातियों में किसकी कितनी हिस्सेदारी (फीसदी में)
यादव, ग्वाला, अहीर--19.40
कुर्मी, पटेल, चनेऊ--7.46
लोध, लोधा, लोधी राजपूत--4.90
गड़रिया, पाल, बघेल--4.43
केवट, मल्लाह, निषाद--4.33
कहार, कश्यप--3.31
मोमिन, अंसार--4.15
तेली, साहू, रोगनगार--4.03
जाट--3.60
कुम्हार, प्रजापति--3.42
काछी, कुशवाहा, शाक्य--3.25
मुराव, मुराई, मौर्य--2.00
माली, सैनी--1.44
नाई, सलमानी, सविता, श्रीवास--3.01
भर, राजभर--2.44
बढ़ई, सैफी, विश्वकर्मा, पांचाल, धीमान--2.37
लेनिया, नौनिया, लोनिया चौहान--2.33
लोहार, लोहार सैफी--1.81
फकीर--1.93
गूजर--1.71
कोइरी--1.66
धुनिया, मंसूरी, कड़ेरे--1.61
भुर्जी, भड़भूजा, भूंज, कसौधन--1.43
दर्जी, इदरीसी--1.01
अन्य--12.97
(नोट- अन्य पिछड़ी जातियों के ये आंकड़े सामाजिक न्याय समिति की संस्तुतियों में शामिल रहे हैं।)
जानें, क्या कहते हैं विशेषज्ञ
- फोटो : प्रतिकात्मक तस्वीर
इस पर मेरठ के सेवानिवृत्त प्राध्यापक एनएएस कॉलेज के डॉ. अशोक शास्त्री कहते हैं कि पिछड़े मोटे तौर पर जातिगत समीकरणों में बंटे हैं। ये अलग-अलग तरह से अलग-अलग दलों के साथ जाते हैं।
इस बार भी किसी के साथ एकमुश्त ध्रुवीकरण की संभावना नहीं है। अभी सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के बीच सियासी कलह ही चल रही है, जिससे तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
यदि अखिलेश कांग्रेस के साथ गठबंधन करते हैं तो वह वर्ग जो भाजपा या बसपा के साथ नहीं जाना चाहता, इनके साथ जा सकता है। पूरी सियासी तस्वीर साफ होने के बाद ही पिछड़ों के मन की थाह लगाना आसान होगा।