लोकसभा चुनाव में हुए बुरे हश्र से झल्लाए आजम खां का कहना है कि मुस्लिमों के एक साथ न होने के कारण सपा को हार मिली।
आजम से जब संवाददाताओं ने प्रदेश में सपा की करारी हार के बारे में पूछा गया तो उन्होने कहा कि मुस्लिमों ने धर्म के आधार पर वोट नहीं किया इसलिए हमें हार का सामना करना पड़ा।
गौरतलब है कि मतदान में वोटों के ध्रुवीकरण की उम्मीद की जा रही थी लेकिन ऐसा नहीं हो सकता और सपा का यादव मुस्लिम वोट पाकर जीत दर्ज करने का मंसूबा धरा रह गया।
आजम बेहद निराश दिखे और अपनी हार का ठीकरा मतदाताओं पर ही फोड़ दिया।
हमने लोगों को अधिक सुविधाएं दी
आजम ने पत्रकारों से अनौपचारिक वार्ता में कहा कि हमने लोगों को इतनी लाइट दे दी कि वह अब पंखे की हवा खाते हैं।
आजम ने निराश होकर कहा कि हमने लोगों को इतनी सुविधाएं दे दी कि वह वोट करने के लिए नहीं निकले, इसलिए सपा को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा।
16 मई को आए लोकसभा चुनाव में सपा को सिर्फ पांच सीटें ही मिल सकीं। जिसमें आजमगढ़ और मैनपुरी में मुलायम सिंह यादव, कन्नौज से डिंपल यादव, बदायूं से धर्मेंद्र यादव और फिरोजाबाद से अक्षय यादव को जीत मिली।
जबकि सपा का दावा था कि पार्टी कम से कम 40 सीटें जीतने में जरूर कामयाब रहेगी।
मुस्लिम नुमाइंदगी शून्य
यह ध्यान देने योग्य है कि यूपी की रामपुर और मुरादाबाद ऐसी सीटें हैं जहां मुस्लिम वोटर ही जीत-हार तय करते हैं। दोनों जगह भाजपा के सांसद चुने गए।
यही नहीं कम से कम आठ और ऐसी सीटें हैं जहां के नतीजों में मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका निभाता है लेकिन इन सीटों से मुस्लिम प्रत्याशी नहीं जीत सके।
मुस्लिम वोटों के बंटवारे और हिंदू मतों के कुछ हद तक ध्रुवीकरण के चलते ऐसा हुआ।
देश के इतिहास में यह पहला मौका है जब 18 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले सूबे से देश की सबसे बड़ी पंचायत में मुस्लिम नुमाइंदगी शून्य रहेगी।
बंट गया मुस्लिम वोट
यूपी में ढाई दर्जन संसदीय सीटों पर मुस्लिम वोट 18 फीसदी तो एक दर्जन पर 35 फीसदी से ज्यादा है।
इनमें से दो को छोड़कर बाकी सभी सीटें भाजपा ने जीती हैं। 35 और 40 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम वोटरों वाले क्षेत्रों में भी कमल खिला।
यही वजह है कि 2004 में 11 और 2009 में सात मुस्लिम सांसद देने वाले यूपी से इस बार मुसलमानों का प्रतिनिधित्व शून्य है। इसकी वजह मुस्लिम वोटों के बंटवारे या रणनीतिक मतदान में उनकी चूक को माना जा रहा है।
मुस्लिम बहुल सीटों पर कई-कई मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे थे। आपसी प्रतिष्ठा की लड़ाई में मुस्लिम वोटों के बंटवारे से भाजपा की राह आसान हो गई।